प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु – अध्याय 6: नरसिंह अवतार का आगमन

नरसिंह अवतार का आगमन
पिछले अध्याय में हिरण्यकशिपु का क्रोध चरम पर पहुँच गया था। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति उसे तनिक भी सहन नहीं हो रही थी और वह अपने पुत्र को बार-बार मारने के प्रयास कर रहा था। हर बार विष्णु भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच जाता, जिससे हिरण्यकशिपु का अहंकार और भी बढ़ जाता। अब वह अपने पुत्र को अंतिम चुनौती देने के लिए तैयार था, यह देखने के लिए कि क्या वास्तव में विष्णु हर जगह व्याप्त हैं जैसा प्रह्लाद दावा करता है।
अंतिम चुनौती
हिरण्यकशिपु का दरबार क्रोध और भय से व्याप्त था। उसकी आँखें लाल थीं, और उसकी वाणी में विष घुला हुआ था। प्रह्लाद, अपने पिता के सामने शांत और स्थिर खड़ा था, उसकी आँखों में विष्णु भगवान के प्रति अटूट विश्वास झलक रहा था। हवा भी मानो थम सी गई थी, हर कोई जानता था कि आज कुछ बहुत बड़ा होने वाला है। सैनिकों के हथियारों की चमक और दरबारियों की कानाफूसी उस भयानक शांति को और भी बढ़ा रही थी।
"प्रह्लाद!" हिरण्यकशिपु दहाड़ा, "तू कहता है कि तेरा विष्णु हर जगह मौजूद है? क्या वह इस खम्भे में भी है?" प्रह्लाद ने निर्भयता से उत्तर दिया, "हाँ पिताजी, मेरे विष्णु कण-कण में व्याप्त हैं। वे हर जगह हैं, इस खम्भे में भी।" हिरण्यकशिपु ने क्रोध से अपने गदा से खम्भे पर प्रहार किया और कहा, "अगर तेरा विष्णु इस खम्भे में है, तो उसे अभी बाहर निकल। मैं देखना चाहता हूँ कि वह मुझे कैसे हराता है!"
स्तम्भ से प्राकट्य
जैसे ही हिरण्यकशिपु ने खम्भे पर प्रहार किया, एक भयंकर गर्जना हुई। धरती काँपने लगी, और आकाश में बिजली चमकने लगी। खम्भे से एक अद्भुत प्राणी प्रकट हुआ - आधा नर और आधा सिंह। भगवान नरसिंह का यह रूप अद्भुत और भयानक था। उनका मुख सिंह का था, और शरीर मनुष्य का। उनकी आँखें जलती हुई अग्नि के समान थीं, और उनकी दहाड़ पूरे ब्रह्माण्ड में गूंज रही थी।
नरसिंह भगवान का प्राकट्य विष्णु भगवान की अद्भुत कृपा का प्रतीक था। उन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने और धरती से पाप का नाश करने के लिए यह रूप धारण किया था। यह अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का एक स्पष्ट संकेत था। नरसिंह भगवान का रूप देखते ही हिरण्यकशिपु के अहंकार और बल का दर्प चूर-चूर हो गया।
हिरण्यकशिपु का वध
नरसिंह भगवान ने एक ही छलांग में हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया। वे उसे दरवाजे की चौखट पर ले गए, जो न घर के अंदर थी और न ही बाहर। उन्होंने हिरण्यकशिपु को अपनी जांघों पर लिटाया और अपने तीखे नाखूनों से उसका वध कर दिया। यह वध न दिन में हुआ, न रात में; न धरती पर, न आकाश में। इस प्रकार, नरसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा जी के उस वरदान का उल्लंघन किए बिना मार डाला, जिसमें उसे किसी मनुष्य या पशु द्वारा, न दिन में, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर मारे जाने का वरदान मिला था। हिरण्यकशिपु के वध के साथ ही सारे संसार में शांति छा गई। देवताओं ने पुष्प वर्षा की और प्रह्लाद की जय-जयकार की। अब अगला अध्याय प्रह्लाद के शासन और शांति के बारे में होगा।
अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अंतिम चुनौती दी और भगवान नरसिंह का प्राकट्य हुआ। नरसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध करके धर्म की स्थापना की और अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, और अहंकार का अंत हमेशा विनाशकारी होता है।
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