प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु – अध्याय 3: प्रह्लाद: गर्भ में ज्ञान

प्रह्लाद: गर्भ में ज्ञान
कश्यप ऋषि और दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु ने इंद्र को पराजित कर त्रिलोकी पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। स्वर्ग पर असुरों का राज हो गया, और देवगण भयभीत होकर छिप गए। हिरण्यकशिपु अपनी शक्ति के मद में चूर था, उसे कोई चुनौती देने वाला नहीं था।
इंद्र का कुप्रयास
हिरण्यकशिपु की पत्नी, कयाधु, गर्भवती थी। असुरों के अत्याचार से व्यथित इंद्र ने अवसर पाकर कयाधु का अपहरण करने का निश्चय किया। वह जानता था कि यदि असुरों का वंश ही नष्ट हो जाए, तो स्वर्ग का भय मिट जाएगा। इंद्र अत्यंत गुप्त रूप से कयाधु के आश्रम में पहुंचा। कयाधु, जो उस समय अकेली थी, इंद्र को देखकर भय से कांप उठी। इंद्र ने उसे पकड़ लिया और उसे स्वर्ग ले जाने के लिए अपने रथ में बैठा लिया। कयाधु असहाय थी, वह केवल अपने गर्भ में पल रहे शिशु के लिए चिंतित थी। "हे प्रभु, मेरे बच्चे की रक्षा करना," उसने मन ही मन प्रार्थना की, उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
"यह क्या कर रहे हो इंद्र?" कयाधु ने डरे हुए स्वर में कहा। "एक निहत्थी और गर्भवती स्त्री का अपहरण करना देवताओं को शोभा नहीं देता! तुम एक महान योद्धा कहलाते हो, क्या यही तुम्हारी वीरता है?" उसके शब्दों में भय और क्रोध का मिश्रण था। इंद्र ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, वह उसे स्वर्ग की ओर ले जा रहा था। वह जानता था कि उसका यह कृत्य धर्म के विरुद्ध है, परंतु असुरों के भय से त्रस्त होकर उसने यह अधर्म करने का निश्चय कर लिया था।
नारद मुनि की कृपा
जैसे ही इंद्र कयाधु को लेकर आकाश में उड़ रहा था, नारद मुनि ने उसे देखा। नारद मुनि, जो तीनों लोकों में भ्रमण करते रहते थे, तुरंत समझ गए कि इंद्र क्या करने जा रहा है। वे तत्काल इंद्र के रथ के सामने प्रकट हो गए। नारद मुनि के तेज से इंद्र अंधा हो गया और उसका रथ रुक गया। नारद मुनि ने शांत स्वर में कहा, "इंद्र, यह तुम क्या कर रहे हो? एक गर्भवती स्त्री का अपहरण करना महापाप है। क्या तुम्हें इसका परिणाम ज्ञात नहीं?"
इंद्र भयभीत होकर बोला, "हे मुनिवर, मैं जानता हूं कि मैं अधर्म कर रहा हूं, परंतु मैं असुरों के भय से त्रस्त हूं। इस गर्भ में पल रहा शिशु आगे चलकर एक शक्तिशाली असुर बनेगा और देवताओं को कष्ट देगा।" नारद मुनि मुस्कुराए और बोले, "इंद्र, यह बालक साधारण नहीं है। इसके गर्भ में स्वयं भगवान विष्णु का अंश है। यह बालक भगवान का परम भक्त होगा और धर्म की स्थापना करेगा। इसे तुम हानि नहीं पहुंचा सकते।" नारद मुनि के वचनों में ऐसी शक्ति थी कि इंद्र तुरंत समझ गया कि उसने कितना बड़ा पाप करने का प्रयास किया था। उसे अपनी भूल का पश्चाताप हुआ। नारद मुनि ने इंद्र को कयाधु को वापस उसके आश्रम में छोड़ने का आदेश दिया। इंद्र ने तुरंत कयाधु को उसके आश्रम में वापस छोड़ दिया और नारद मुनि से क्षमा मांगी। नारद मुनि कयाधु को अपने आश्रम में ले गए और उसकी रक्षा करने लगे। विष्णु की कृपा से, कयाधु और उसके गर्भ में पल रहे शिशु, प्रह्लाद, दोनों सुरक्षित थे।
गर्भ में ज्ञान
नारद मुनि ने कयाधु को विष्णु भक्ति का उपदेश देना आरम्भ किया। जब नारद मुनि विष्णु के गुणों का वर्णन करते, तो कयाधु प्रेम और भक्ति से भर जाती। आश्चर्य की बात यह थी कि कयाधु के गर्भ में पल रहा शिशु, प्रह्लाद, भी नारद मुनि के उपदेशों को सुन रहा था और भगवान विष्णु के प्रति उसकी श्रद्धा बढ़ती जा रही थी। नारद मुनि के आशीर्वाद से प्रह्लाद को गर्भ में ही विष्णु भक्ति का ज्ञान प्राप्त हो गया। वह जन्म से ही भगवान विष्णु का परम भक्त बन गया। गर्भावस्था में नारद मुनि के सतसंग के प्रभाव से प्रह्लाद के मन में भगवान विष्णु के प्रति अटूट प्रेम उत्पन्न हो गया, जो जीवनभर अटल रहा। कयाधु ने भी प्रह्लाद को गर्भ में ही नारायण भक्ति का ज्ञान देने के लिए नारद मुनि को बारंबार धन्यवाद दिया।
अध्याय 3 का सार: इंद्र ने कयाधु का अपहरण करने का प्रयास किया, लेकिन नारद मुनि ने उसकी रक्षा की। नारद मुनि ने कयाधु को विष्णु भक्ति का उपदेश दिया, जिससे प्रह्लाद को गर्भ में ही विष्णु भक्ति का ज्ञान प्राप्त हो गया तथा वह भगवान का अनन्य भक्त बन गया। इस अध्याय से यह सीख मिलती है कि भक्ति और ज्ञान किसी भी अवस्था में प्राप्त किया जा सकता है, और भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
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