प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु – अध्याय 2: कश्यप और दिति की संतान

कश्यप और दिति की संतान
हिरण्यकशिपु के अमर होने के वरदान की लालसा में तपस्या भंग हो गई थी। अब धरती पर एक नई कहानी जन्म लेने वाली थी, देवताओं और असुरों के मध्य एक और भीषण संग्राम की कथा। यह कथा आरम्भ होती है ऋषि कश्यप और दिति के मिलन से, जिनकी कोख से दो ऐसे पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने देवलोक को थर्रा दिया।
कश्यप ऋषि और दिति का विवाह
अपनी तपस्या से विख्यात ऋषि कश्यप, जो प्रजापति दक्ष की पुत्री दिति से विवाह बंधन में बंधे थे, का आश्रम सुरम्य वन में स्थित था। चारों ओर शांति छाई रहती थी, पक्षियों का कलरव और नदियों की मधुर ध्वनि वातावरण को पवित्र बनाती थी। दिति एक गुणवती और पतिव्रता नारी थीं, जो अपने पति की सेवा में सदैव तत्पर रहती थीं। उनके मन में सदैव संतान की अभिलाषा रहती थी, एक ऐसा पुत्र जो बलशाली और पराक्रमी हो, जो देवताओं पर विजय प्राप्त कर सके और असुरों का गौरव बढ़ा सके। दिति और कश्यप ऋषि का प्रेम गहरा था, और उनकी यह अभिलाषा स्वाभाविक थी।
एक दिन दिति ने कश्यप ऋषि से अपनी इच्छा प्रकट की, "हे स्वामी, मेरा मन पुत्र प्राप्ति के लिए व्याकुल है। मैं चाहती हूँ कि हमारी संतान देवताओं से भी अधिक शक्तिशाली हो।" कश्यप ऋषि ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "हे देवी, तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। मैं जानता हूँ तुम्हारे हृदय में असुरों के प्रति प्रेम है, और तुम एक ऐसे पुत्र को जन्म देना चाहती हो, जो उनके मान-सम्मान की रक्षा कर सके। मैं भगवान विष्णु से प्रार्थना करूंगा कि तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो।"
हिरण्याक्ष का जन्म और विष्णु से युद्ध
समय बीतता गया और दिति गर्भवती हुईं। उनकी कोख से एक भयंकर असुर ने जन्म लिया, जिसका नाम हिरण्याक्ष रखा गया। हिरण्याक्ष अपनी माता के गर्भ से ही शक्तिशाली था और जन्म लेते ही उसने पृथ्वी को कंपा दिया। वह दैत्यों में सबसे बलवान था और अपने पराक्रम से उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। अपनी शक्ति के मद में चूर होकर हिरण्याक्ष ने एक दिन पृथ्वी को उठाकर समुद्र में डुबो दिया। देवताओं और ऋषि-मुनियों में हाहाकार मच गया क्योंकि हिरण्याक्ष का अत्याचार बढ़ता जा रहा था।
पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया। वराह रूप में भगवान विष्णु ने अपने दांतों पर पृथ्वी को उठाया और समुद्र से बाहर निकाला। फिर हिरण्याक्ष के साथ उनका भयंकर युद्ध हुआ। भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के आगे हिरण्याक्ष की एक न चली और अंततः वह मारा गया। भगवान विष्णु की कृपा से पृथ्वी फिर से अपने स्थान पर स्थापित हो गई और देवताओं ने राहत की सांस ली। यह देखकर दिति शोक में डूब गई और भगवान विष्णु से क्रोधित हो उठी, क्योंकि उन्होंने उसके पुत्र का वध किया था।
हिरण्यकशिपु का प्रतिशोध लेने का संकल्प
अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु का समाचार सुनकर हिरण्यकशिपु क्रोध से जल उठा। उसका हृदय प्रतिशोध की अग्नि में धधकने लगा। उसने उसी क्षण भगवान विष्णु से अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने की प्रतिज्ञा कर ली। उसने ठान लिया कि वह भगवान विष्णु को पराजित करेगा और देवताओं पर अपना आधिपत्य स्थापित करेगा। हिरण्यकशिपु जानता था कि ऐसा करने के लिए उसे और भी अधिक शक्तिशाली बनना होगा, और इसीलिए वह फिर से कठोर तपस्या करने का निश्चय करता है, जिसकी तपस्या का फल प्रह्लाद की जन्मकथा लिखेगा।
अध्याय 2 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि ऋषि कश्यप और दिति से हिरण्याक्ष का जन्म हुआ, जिसने अपने अत्याचारों से तीनों लोकों को त्रस्त कर दिया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध किया, जिससे हिरण्यकशिपु क्रोधित हो उठा और उसने विष्णु से बदला लेने का संकल्प लिया। यह घटना दिखाती है कि अहंकार और शक्ति का दुरुपयोग विनाशकारी होता है, और ईश्वरीय शक्ति के सामने किसी का बल नहीं चलता।
आज का पंचांग 1 अगस्त 2026
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