प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु – अध्याय 1: हिरण्यकशिपु: वरदान और क्रोध

हिरण्यकशिपु: वरदान और क्रोध
युगों पूर्व, जब देव और असुरों के मध्य संघर्ष अपने चरम पर था, तब प्रजापति कश्यप के दो पुत्र, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, असुर कुल को गौरव दिलाने के लिए कृतसंकल्प थे। हिरण्याक्ष की मृत्यु से हिरण्यकशिपु के मन में देवताओं के प्रति बदले की आग धधक उठी थी। वह अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने और तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल था।
घोर तपस्या
हिरण्यकशिपु मंदराचल पर्वत की तलहटी में पहुंचा। उसने अपने वस्त्र त्याग दिए, देह को तपाने वाली धूप और वर्षा को सहन किया, और केवल वायु भक्षण कर कठोर तपस्या आरंभ की। उसकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि तीनों लोकों में हलचल मच गई। अग्नि प्रज्वलित हुई, नदियां सूखने लगीं, और पर्वत कांपने लगे। देवता भयभीत हो गए, क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि हिरण्यकशिपु की तपस्या का उद्देश्य अमृत्व प्राप्त करना और स्वर्ग पर अधिकार जमाना है। ऋषियों और मुनियों ने भी चिंता व्यक्त की, क्योंकि उन्हें पता था कि यदि हिरण्यकशिपु अपनी इच्छा में सफल हो गया, तो धर्म का नाश हो जाएगा और पाप बढ़ जाएगा।
हिरण्यकशिपु ने अपने मन में दृढ़ निश्चय किया, "मैं अपने भाई की मृत्यु का बदला अवश्य लूंगा! इंद्र और अन्य देवता मिलकर भी मेरा सामना नहीं कर पाएंगे। मैं ऐसा वरदान प्राप्त करूंगा कि कोई भी प्राणी, देवता, असुर, मानव या पशु मुझे मार न सके।" उसकी आंखें क्रोध से लाल थीं, और उसका हृदय प्रतिशोध की ज्वाला से जल रहा था। उसने संकल्प लिया कि जब तक वह अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर लेता, तब तक वह तपस्या करता रहेगा, चाहे इसके लिए उसे अपना जीवन ही क्यों न त्यागना पड़े।
ब्रह्मा जी का वरदान
हिरण्यकशिपु की घोर तपस्या से ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए। वे असुरराज के समक्ष प्रकट हुए, उनका तेज सूर्य के समान था, और उनके चारों मुखों से वेद ध्वनि निकल रही थी। ब्रह्मा जी ने कहा, "हे हिरण्यकशिपु, मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम जो वर मांगना चाहते हो, मांगो, मैं उसे पूर्ण करूंगा।" हिरण्यकशिपु ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनम्रता से कहा, "हे देवों के देव ब्रह्मा जी, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि न मैं दिन में मरूं, न रात में; न मैं घर के अंदर मरूं, न बाहर; न मैं पृथ्वी पर मरूं, न आकाश में; न मनुष्य द्वारा मरूं, न पशु द्वारा; न किसी शस्त्र द्वारा मरूं, न किसी अस्त्र द्वारा।"
ब्रह्मा जी ने "तथास्तु" कहा और अंतर्ध्यान हो गए। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान मांगा था जो देखने में अमरता प्रतीत होता था। उसने सोचा कि ब्रह्मा जी ने उसे अजेय बना दिया है, और अब तीनों लोकों पर उसका शासन निर्विवाद होगा। परन्तु, विष्णु के भक्त जानते हैं, कि भगवान की लीला अपरम्पार है। ऐसा वरदान, जो सतही तौर पर अमरता जैसा दिखता है, वास्तव में दैत्य के विनाश का मार्ग प्रशस्त करेगा।
तीनों लोकों पर अत्याचार
वरदान प्राप्त करने के पश्चात, हिरण्यकशिपु का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया, इंद्र को पराजित किया और देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया। फिर उसने पृथ्वी पर अपना अधिकार जमा लिया और ऋषियों, मुनियों और ब्राह्मणों को सताना शुरू कर दिया। उसने यज्ञ और हवन बंद करवा दिए और वेदों के पठन-पाठन पर रोक लगा दी। हिरण्यकशिपु ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया और लोगों को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य किया। उसने कहा, "मैं ही ईश्वर हूं, मैं ही सर्वशक्तिमान हूं। अब से केवल मेरी ही पूजा होगी।"
देवता, ऋषि और मुनि विष्णु की शरण में गए और उनसे प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा, "हे भगवान, इस दुष्ट हिरण्यकशिपु से हमें बचाओ। उसने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा है। धर्म का नाश हो रहा है और अधर्म बढ़ रहा है। कृपया हमारी रक्षा करें।" विष्णु ने आश्वासन दिया कि वे उचित समय पर अवतार लेंगे और हिरण्यकशिपु का अंत करेंगे। उन्होंने कहा, "धर्म की रक्षा के लिए मैं अवश्य आऊंगा।"
अध्याय 1 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त किया और फिर तीनों लोकों पर अत्याचार करने लगा। यह दिखाता है कि अहंकार मनुष्य को अंधा बना देता है और उसे विनाश की ओर ले जाता है। परन्तु, भगवान विष्णु अपने भक्तों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं, चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो।
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