प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु – अध्याय 4: प्रह्लाद की अटूट भक्ति

प्रह्लाद की अटूट भक्ति
पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार देवर्षि नारद ने रानी कयाधु को नारायण की महिमा से परिचित कराया, जिसके फलस्वरूप उनके गर्भ में पल रहा शिशु, प्रह्लाद, जन्म से ही विष्णु भक्ति से ओतप्रोत हो गया। अब समय आ गया था उस शिशु के इस संसार में आने का, और उस भक्ति के प्रस्फुटन का जो आगे चलकर एक अद्भुत उदाहरण बनने वाली थी।
प्रह्लाद का जन्म और बालकाल
शुभ घड़ी आई और कयाधु ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उसका मुख कमल के समान खिला हुआ था और उसकी आँखों में एक अद्भुत शांति और प्रेम झलक रहा था। सम्पूर्ण असुर लोक में हर्ष की लहर दौड़ गई। हिरण्यकशिपु, अपने पुत्र के जन्म से अत्यंत प्रसन्न हुए, हालाँकि उन्हें यह आभास तक नहीं था कि यह बालक उनकी असुर-साम्राज्य की नींव हिला देगा। शिशु प्रह्लाद दिन-ब-दिन बढ़ने लगे। उनका शरीर स्वर्ण के समान दमकता था और उनकी वाणी में अमृत घुला हुआ था। वे सदा शांत और प्रसन्न रहते थे, मानों किसी दिव्य आनंद में लीन हों। माता कयाधु उन्हें भगवान विष्णु की कथाएँ सुनाती, जिन्हें वे बड़ी श्रद्धा से सुनते और उनके नन्हे हृदय में भक्ति का बीज और गहरा होता जाता था।
“हे नारायण, हे विष्णु,” प्रह्लाद अक्सर अपने माता के आंचल में दुबके हुए धीरे से गुनगुनाते थे। कयाधु मुस्कुराती और अपने पुत्र को और भी स्नेह से अपने हृदय से लगा लेती। “मेरा प्यारा प्रह्लाद, तुम्हारी वाणी में ही नारायण का वास है,” वह कहती, अपने पुत्र के भविष्य के बारे में अनिश्चितताओं से भरी हुई।
गुरुकुल में नारायण का जाप
जब प्रह्लाद थोड़े बड़े हुए, तो उन्हें शुक्राचार्य के पुत्रों, शंड और अमर्क के गुरुकुल में शिक्षा के लिए भेजा गया। हिरण्यकशिपु चाहते थे कि उनका पुत्र नीतिशास्त्र, शस्त्र विद्या और असुरों के नियमों का ज्ञान प्राप्त करे, ताकि वह भविष्य में असुर साम्राज्य का उत्तराधिकारी बन सके। गुरुकुल में अन्य बालकों के साथ प्रह्लाद भी शिक्षा ग्रहण करने लगे, परन्तु उनका मन सांसारिक ज्ञान में नहीं लगता था। उन्हें तो हर पल भगवान विष्णु का ध्यान रहता था। वे अपने गुरुओं द्वारा सिखाई गई बातों को सुनते अवश्य थे, परन्तु उनका मन नारायण के नाम में ही रमा रहता था।
एक दिन, शंड ने प्रह्लाद से पूछा, “प्रह्लाद, तुमने आज क्या सीखा?” प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “गुरुजी, मैंने सीखा कि नारायण ही सत्य हैं, वही जगत के पालनहार हैं और वही सब कुछ हैं।” शंड और अमर्क आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया कि वे असुर कुल के राजकुमार हैं और उन्हें नारायण की नहीं, बल्कि असुरों की आराधना करनी चाहिए। परन्तु प्रह्लाद पर उनकी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। विष्णु की कृपा उन पर बनी हुई थी। उनके हृदय में नारायण का प्रेम इतना गहरा था कि उसे कोई भी सांसारिक बंधन नहीं तोड़ सकता था। भगवान विष्णु स्वयं प्रह्लाद की रक्षा कर रहे थे, उन्हें हर विपत्ति से बचा रहे थे और उन्हें अपनी भक्ति के मार्ग पर अग्रसर कर रहे थे। उनकी भक्ति एक ऐसे दीपक की भांति जल रही थी, जिसे बुझाने का प्रयास करने पर वह और भी प्रज्वलित हो उठता था।
हर जगह नारायण
प्रह्लाद गुरुकुल में खेलते, खाते-पीते, उठते-बैठते हर समय नारायण का नाम जपते रहते थे। उनके साथी बालक भी उनकी भक्ति से प्रभावित होने लगे थे। धीरे-धीरे, गुरुकुल में भी ‘नारायण’ नाम की गूंज सुनाई देने लगी थी। जब हिरण्यकशिपु को यह बात पता चली तो उनका क्रोध चरम सीमा पर पहुँच गया। वे अपने पुत्र की इस भक्ति को किसी भी कीमत पर रोकना चाहते थे। उन्होंने प्रह्लाद को अपने पास बुलवाया और उसे समझाने का प्रयास किया, परन्तु प्रह्लाद अपनी भक्ति पर अडिग रहे। यह देखकर हिरण्यकशिपु का क्रोध और भी बढ़ गया, और उन्होंने प्रह्लाद को मारने का निश्चय कर लिया।
प्रह्लाद का नारायण प्रेम हिरण्यकशिपु के अहंकार के लिए एक चुनौती बन गया था। वह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि उसका पुत्र किसी और शक्ति के आगे नतमस्तक हो। हिरण्यकशिपु के क्रोध की अग्नि अब और भी भड़कने वाली थी, जिसके परिणाम भयंकर होने वाले थे। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि हिरण्यकशिपु अपने पुत्र को विष्णु भक्ति से दूर करने के लिए क्या-क्या उपाय करते हैं और प्रह्लाद अपनी अटूट भक्ति के बल पर कैसे हर परीक्षा में सफल होते हैं।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने प्रह्लाद के जन्म और बालकाल का वर्णन देखा। प्रह्लाद जन्म से ही विष्णु भक्त थे और गुरुकुल में भी उन्होंने अपनी भक्ति को बनाए रखा, जिससे उनके पिता हिरण्यकशिपु क्रोधित हो गए। इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति अटूट होती है और उसे किसी भी सांसारिक बंधन से नहीं तोड़ा जा सकता।
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