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प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु – अध्याय 7: प्रह्लाद का शासन और शांति

Tilak Kathayein12 Apr 2026145 views📖 1 min read
प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु
प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु का अध्याय 7 — प्रह्लाद का शासन और शांति। नरसिंह भगवान के शांत होने पर प्रह्लाद उनकी स्तुति करते हैं और फिर वे राजा बनते हैं, जिससे जगत में शांति स्थापित होती है।

प्रह्लाद का शासन और शांति

नरसिंह भगवान का क्रोध शांत हो चुका था, हिरण्यकशिपु का अंत हो चुका था। संपूर्ण ब्रह्मांड भयावह सन्नाटे में डूबा हुआ था। देवता और ऋषि-मुनि भय से काँप रहे थे, किसी में भी नरसिंह भगवान के तेज के सामने जाने का साहस नहीं था। केवल एक बालक, प्रह्लाद, उनमें शांति स्थापित कर सकता था।

भक्त प्रह्लाद की स्तुति

प्रह्लाद भगवान नरसिंह के चरणों में दंडवत प्रणाम करने के लिए आगे बढ़ा। उसका हृदय भक्ति से ओतप्रोत था, आँखों में प्रेम के आँसू थे। वह जानता था कि ये क्रोधित रूप उसके पिता के दुष्ट कर्मों का परिणाम है, और भगवान का हृदय तो दया से भरा हुआ है। उसने बिना किसी डर के भगवान की ओर देखा, उसका छोटा सा शरीर नरसिंह भगवान के तेज से जगमगा रहा था।

प्रह्लाद ने अपनी वाणी से स्तुति आरंभ की, "हे भगवान नरसिंह, आप ब्रह्मांड के रक्षक हैं। आपकी शक्ति अनंत है, आपका प्रेम असीम है। मैं एक तुच्छ बालक हूँ जो आपकी महिमा का वर्णन करने में असमर्थ हूँ, परन्तु मेरा हृदय आपको समर्पित है। मेरे पिता ने आपको पहचानने से इनकार कर दिया, और उन्होंने घोर पाप किए। आपने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया। अब आप शांत हो जाएं, भगवन। अब इस संसार को आपकी कृपा की आवश्यकता है।" उसकी स्तुति में भक्ति, विनय और समर्पण का भाव था।

उसी क्षण, नरसिंह भगवान की आँखे कुछ नर्म हुईं। उन्होंने प्रह्लाद को अपने पास बुलाया और उसे अपनी गोद में बिठाया। उनके स्पर्श से प्रह्लाद के सारे भय दूर हो गए। भगवान ने अपने हाथ से प्रह्लाद के सिर पर आशीर्वाद दिया। नरसिंह भगवान बोले, "हे प्रह्लाद, तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। तुमने मुझे शांत किया है। तुम्हारा हृदय शुद्ध है, और तुम मेरे प्रिय भक्त हो। वर मांगो, वत्स।"

प्रह्लाद ने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु, मुझे कोई वर नहीं चाहिए। मेरी एकमात्र प्रार्थना यह है कि आप मेरे पिता को क्षमा कर दें। वे अज्ञान के कारण आपसे विमुख हो गए थे।"

प्रह्लाद का राज्याभिषेक

भगवान नरसिंह ने कहा, "हे प्रह्लाद, तुम्हारे पिता को क्षमा कर दिया गया है। इतना ही नहीं, तुम्हारी सात पीढ़ियों तक के सभी पाप आज से धुल जाएंगे। तुम इस राज्य के राजा बनोगे, और धर्म के मार्ग पर चलकर प्रजा का पालन करोगे।" इतना कहकर नरसिंह भगवान अंतर्ध्यान हो गए।

देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की, और ऋषि-मुनियों ने ‘विष्णु भगवान की जय’ के नारे लगाए। प्रह्लाद को सिंहासन पर बैठाया गया। गुरु शुक्राचार्य ने वैदिक मंत्रों के साथ उनका राज्याभिषेक किया। प्रह्लाद ने नम्रतापूर्वक सिंहासन स्वीकार किया। उनका हृदय भगवान विष्णु के प्रति कृतज्ञता से भरा हुआ था।

प्रह्लाद धर्मात्मा शासक बने। उन्होंने अपने राज्य में धर्म की पुनर्स्थापना की। उन्होंने वर्ण व्यवस्था का पालन करवाया और सभी को अपने कर्मों के अनुसार जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यज्ञ, तप और दान को प्रोत्साहित किया। प्रह्लाद ने प्रजा को भगवान विष्णु की भक्ति करने के लिए प्रेरित किया, और उनके राज्य में शांति और समृद्धि का वास हो गया।

प्रह्लाद ने अपने शासनकाल में कभी भी किसी को कष्ट नहीं पहुंचाया। वे हमेशा न्याय के मार्ग पर चले। उनके राज्य में सभी सुखी थे। उन्होंने गौ-ब्राह्मणों की रक्षा की। प्रह्लाद एक आदर्श राजा बनकर उभरे, जिन्होंने अपने भक्त के रूप में अपनी पहचान कभी नहीं खोई। भगवान विष्णु की कृपा उन पर सदैव बनी रही।

युगों तक शांति

प्रह्लाद ने कई वर्षों तक कुशलतापूर्वक शासन किया। उनकी भक्ति और धर्माचरण ने उनके राज्य को समृद्ध बनाया। आने वाली पीढ़ियों तक, प्रह्लाद का नाम धर्म और न्याय के प्रतीक के रूप में अमर हो गया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि भगवान विष्णु अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं, चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों। प्रह्लाद की कहानी आज भी हमें भक्ति, साहस और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह कथा युगों तक सुनाई जाती रहेगी, और भगवान विष्णु के भक्तों को शक्ति प्रदान करती रहेगी।

अध्याय 7 का सार: इस अध्याय में प्रह्लाद द्वारा नरसिंह भगवान की स्तुति, उनका राजा बनना और उनके धर्मनिष्ठ शासन का वर्णन है। यह दिखाता है कि सच्ची भक्ति से भगवान प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, और धर्म का पालन करने से शांति और समृद्धि आती है।

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आज का पंचांग 31 अगस्त 2026

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