ध्रुव भक्त कथा – अध्याय 1: तिरस्कार और ध्रुव का संकल्प

तिरस्कार और ध्रुव का संकल्प
राजा उत्तानपाद अपनी दो पत्नियों - सुरुचि और सुनीति के साथ न्यायपूर्ण शासन कर रहे थे। सुरुचि राजा की प्रिय पत्नी थी, जिसके कारण उसे राजमहल में विशेष सम्मान प्राप्त था, जबकि सुनीति शांत स्वभाव की, किन्तु राजा की कम प्रिय पत्नी थी। नियति ने कुछ ऐसा चक्र घुमाया कि एक घटना ने बालक ध्रुव के जीवन की दिशा ही बदल दी।
राजसभा में अपमान
राजसभा में, राजा उत्तानपाद अपने प्रिय पुत्र उत्तम को गोद में लिए बैठे थे। उत्तम सुरुचि का पुत्र था। उसी समय, पाँच वर्षीय बालक ध्रुव, जो सुनीति का पुत्र था, पिता की गोद में बैठने की इच्छा से दौड़ता हुआ आया। उसकी आँखों में पिता का प्रेम पाने की लालसा स्पष्ट झलक रही थी। ध्रुव ने नादान मुस्कान के साथ राजा की ओर हाथ बढ़ाया, मानो कह रहा हो कि "पिताजी, मुझे भी अपने पास बिठाइए।" सभा में उपस्थित सभी लोग स्नेह भरी नज़रों से ध्रुव को देख रहे थे। परन्तु, ऐसा प्रेम और स्नेह सुरुचि को सहन नहीं हुआ। उसकी आँखों में क्रोध की ज्वाला धधक उठी।
सुरुचि ने बालक ध्रुव को कठोरता से पकड़कर दूर खींचते हुए कहा, "ध्रुव! तुम्हें यह अधिकार नहीं है कि तुम राजा के सिंहासन को स्पर्श करो। तुम नीच कुल में जन्में हो। केवल मेरे पुत्र को ही यह अधिकार है। यदि तुम सिंहासन पर बैठना चाहते हो, तो तुम्हें मेरे गर्भ से जन्म लेना होगा!" उसके शब्द बाण की तरह ध्रुव के हृदय में चुभ गए। ध्रुव की मासूम आँखों में आँसू भर आए। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसने ऐसा क्या अपराध किया है जिसके कारण उसे इतना तिरस्कार मिल रहा है।
माता सुनीति का परामर्श
रोता हुआ ध्रुव अपनी माता सुनीति के पास गया। सुनीति ने अपने पुत्र को सीने से लगाया और स्नेह से उसके आँसू पोंछे। ध्रुव ने अपनी माता को राजसभा में हुए अपमान के बारे में बताया। सुनीति का हृदय अपने पुत्र के दुख से पिघल गया, परन्तु उसने धैर्य नहीं खोया। उसने ध्रुव को समझाया कि भाग्य को बदला जा सकता है। सुनीति ने कहा, "पुत्र, सुरुचि के वचन कठोर अवश्य हैं, परन्तु सत्य हैं। तुम्हें राज सिंहासन पाने के लिए तपस्या करनी होगी। भगवान विष्णु की आराधना करो। वे ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे।"
सुनीति ने ध्रुव को भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन किया। उसने बताया कि विष्णु ही सृष्टि के पालनहार हैं और वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। सुनीति ने अपने पुत्र को धर्म के मार्ग पर चलने और कभी भी अपने हृदय में द्वेष न रखने की शिक्षा दी। ध्रुव ने अपनी माता के वचनों को ध्यान से सुना। उसके मन में भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई और उसने तपस्या करने का निश्चय किया। उसने अपनी माता से आशीर्वाद माँगा कि वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो। सुनीति ने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और उसे वन में जाने की अनुमति दे दी। उसने कहा, "पुत्र, भगवान विष्णु तुम्हारी रक्षा करेंगे।"
वन की ओर प्रस्थान
ध्रुव ने अपनी माता से विदा ली और वन की ओर चल पड़ा। उसका छोटा सा मन आत्मविश्वास से भरा हुआ था। रास्ते में उसने कई प्रकार के वन देखे, परन्तु उसका ध्यान केवल भगवान विष्णु पर था। उसने अपने मन में दृढ़ संकल्प कर लिया था कि वह भगवान विष्णु को प्रसन्न करके ही लौटेगा। ध्रुव की दृढ़ता और भक्ति देखकर प्रकृति भी उसकी सहायता करने के लिए तत्पर थी। उसे रास्ते में फल और जल आसानी से मिल जाते थे।
ध्रुव का एकमात्र लक्ष्य भगवान विष्णु के दर्शन करना था। उसे विश्वास था कि उसकी भक्ति अवश्य सफल होगी। बाल ध्रुव का यह अटूट विश्वास ही उसे आगे ले गया। यह विष्णु की ही कृपा थी कि ध्रुव को इतनी कम उम्र में तपस्या का मार्ग सूझा और उसने अपने अपमान का बदला लेने के बजाय भगवान की शरण में जाने का निश्चय किया। अब इस बालक को मार्गदर्शन की आवश्यकता थी, और जल्दी ही विष्णु ने इसकी व्यवस्था कर ही दी।
अध्याय 1 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि ध्रुव को राजसभा में अपमानित किया गया और उसने अपनी माता सुनीति से परामर्श लिया। सुनीति ने उसे भगवान विष्णु की आराधना करने का मार्ग दिखाया और ध्रुव ने तपस्या करने का निश्चय किया। इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी अपने अपमान से निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि भगवान की शरण में जाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। अगला अध्याय बताएगा कि कैसे नारद मुनि ध्रुव को उसका मंत्र देंगे और मार्गदर्शन करेंगे।
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