प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु – अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का क्रोध बढ़ता है

हिरण्यकशिपु का क्रोध बढ़ता है
पिछले अध्याय में प्रह्लाद की अटूट विष्णु भक्ति देखकर असुरराज हिरण्यकशिपु क्रोध से जल रहे थे। उनका अहंकार और भी अधिक आहत हुआ था क्योंकि उनका अपना पुत्र, जिसे उन्होंने असुर कुल का गौरव बनाने के सपने देखे थे, विष्णु का परम भक्त बन बैठा था। अब हिरण्यकशिपु किसी भी कीमत पर प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से दूर करना चाहता था, भले ही इसके लिए उसे अपने पुत्र को दंडित करना पड़े। उसका क्रोध धीरे-धीरे एक भयानक तूफान का रूप ले रहा था, जो विनाश करने के लिए आतुर था।
समझाने का प्रयास
हिरण्यकशिपु सिंहासन पर बैठे हुए थे, उनका चेहरा लाल हो रहा था। प्रह्लाद को उनके सामने लाया गया। प्रह्लाद, अपने पिता के क्रोध को देखकर थोड़ा भी विचलित नहीं हुआ, बल्कि उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और विष्णु का ध्यान करने लगा। हिरण्यकशिपु ने गहरी साँस ली, अपने क्रोध को दबाने की कोशिश करते हुए, और फिर अपने बेटे को समझाने का प्रयास किया। वो चाहता था कि प्रह्लाद उसकी बात समझे और विष्णु भक्ति को त्याग दे।
“प्रह्लाद,” हिरण्यकशिपु गरजे, “क्या तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारा पिता हूँ, तुम्हारा राजा हूँ? तुम मुझसे बड़ा किसी और को कैसे मान सकते हो? विष्णु मेरा शत्रु है! तुम क्यों उसकी पूजा करते हो? क्या तुम्हें मेरे प्यार और शक्ति पर विश्वास नहीं है?" प्रह्लाद ने शांति से उत्तर दिया, "पिताजी, विष्णु ही सत्य हैं। वे ही सबके रक्षक हैं। वे आपके भी स्वामी हैं।” हिरण्यकशिपु का क्रोध अब असहनीय हो गया। उसने प्रह्लाद को झकझोर कर कहा, "मैं तुम्हे आखरी बार चेतावनी दे रहा हूँ, मूर्ख! विष्णु का नाम लेना छोड़ दो, वरना इसके परिणाम बहुत भयंकर होंगे!"
मृत्यु के विभिन्न प्रयास
जब हिरण्यकशिपु ने देखा कि प्रह्लाद किसी भी तरह से अपनी भक्ति से डिगने को तैयार नहीं है, तो उसने उसे मारने का निर्णय लिया। उसने अपने असुर सैनिकों को आदेश दिया कि वे प्रह्लाद को ऊँची पहाड़ी से नीचे धकेल दें। सैनिक उसके आदेश का पालन करते हुए प्रह्लाद को पर्वत शिखर पर ले गए और उसे नीचे गिरा दिया। लेकिन, विष्णु की कृपा से, प्रह्लाद सुरक्षित रूप से नीचे आ गया, उसे खरोंच तक नहीं आई। उसकी भक्ति और भी दृढ़ हो गई, हर संकट उसे विष्णु के प्रति और भी समर्पित बनाता गया।
फिर, हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को जंगली हाथियों से कुचलवाने का आदेश दिया। विशाल हाथियों को क्रोधित किया गया और प्रह्लाद पर छोड़ा गया। परन्तु जैसे ही हाथी प्रह्लाद के पास पहुंचे, वे शांत हो गए और उन्होंने प्रह्लाद को प्रणाम किया। यह देखकर हिरण्यकशिपु और भी क्रोधित हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो कैसे विष्णु की शक्ति से मुकाबला करे। उसे लग रहा था जैसे सारी सृष्टि विष्णु की भक्ति में लीन है और केवल वो ही अंधकार में डूबा हुआ है। विष्णु की महिमा हर प्रयास के साथ और भी स्पष्ट होती जा रही थी।
विष का प्रभाव न होना
अंत में, हिरण्यकशिपु ने सबसे घातक उपाय अपनाया। उसने प्रह्लाद को विष देने का आदेश दिया। शक्तिशाली विष को प्रह्लाद के भोजन में मिला दिया गया। प्रह्लाद ने शांत मन से भोजन ग्रहण किया, विष्णु का नाम जपते हुए। विष का उस पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। विष्णु की कृपा से वह विष अमृत में परिवर्तित हो गया। यह देखकर हिरण्यकशिपु हतप्रभ रह गया। उसकी सारी योजनाएँ विफल हो रही थीं। उसका क्रोध चरम सीमा पर पहुँच गया। उसे अब यह निश्चित हो गया कि प्रह्लाद के शरीर की रक्षा कोई अलौकिक शक्ति कर रही है और वो शक्ति विष्णु ही है।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे हिरण्यकशिपु का क्रोध प्रह्लाद की विष्णु भक्ति के कारण बढ़ता गया। उसने प्रह्लाद को समझाने और मारने के कई प्रयास किए, लेकिन विष्णु की कृपा से प्रह्लाद हर बार सुरक्षित रहा। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति अविनाशी होती है और परमात्मा अपने भक्त की हमेशा रक्षा करते हैं। प्रह्लाद की परीक्षा हिरण्यकशिपु के क्रोध को चरम पर ले जाती है, जो अगले अध्याय में नरसिंह अवतार के आगमन का कारण बनती है।
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