नरसिंह अवतार कथा – अध्याय 3: कठिनाइयाँ और परीक्षाएँ
कठिनाइयाँ और परीक्षाएँ
पिछले अध्याय में हमने प्रह्लाद की अटूट भक्ति देखी। हिरण्यकशिपु इस भक्ति से अत्यंत क्रोधित था। वह अपने पुत्र को विष्णु की भक्ति से हटाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार था, चाहे इसके लिए उसे क्रूरता की सारी हदें पार करनी पड़ें। उसने अपने मंत्रियों और अनुचरों को आदेश दिया कि प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से विमुख करने के लिए हर उपाय का प्रयोग करें, और यदि वह फिर भी न माने, तो उसे मार डालें।
विष का प्याला
प्रह्लाद की भक्ति से क्रोधित हिरण्यकशिपु ने सबसे पहले उसे विष देने का निर्णय लिया। उसने अपने रसोइयों को सबसे घातक विष तैयार করার आदेश दिया। रसोइयों ने तुरंत ही विष तैयार किया, जिसका एक बूंद भी किसी भी जीवित प्राणी को पल भर में मार सकता था। उस विष को प्रह्लाद को पिलाने के लिए लाया गया। प्रह्लाद शांत भाव से बैठा हुआ था, उसके मुख पर विष्णु नाम का जाप चल रहा था। उसके मन में रंच मात्र भी भय नहीं था।
“यह क्या है, पिता?” प्रह्लाद ने पूछा, उसकी वाणी में कोमल जिज्ञासा थी। हिरण्यकशिपु गरजा, “यह अमृत है, मूर्ख! इसे पीकर तू बलवान बनेगा और विष्णु का नाम भूल जाएगा।” प्रह्लाद मुस्कुराया, “मेरे लिए तो विष्णु नाम ही अमृत है, पिता। परंतु आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है।” उसने विष का प्याला उठाया और विष्णु का नाम जपा। उसने ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हुए विष पी लिया।
हाथी का आक्रमण
विष का कोई प्रभाव न होने पर हिरण्यकशिपु का क्रोध और बढ़ गया। उसने अब प्रह्लाद को मारने का दूसरा तरीका सोचा। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे एक विशाल और क्रूर हाथी को लाएं और उसे प्रह्लाद को कुचलने के लिए छोड़ दें। सैनिक एक विशालकाय हाथी को लेकर आए, जिसकी चिंघाड़ से पूरा महल कांप उठा। हाथी को क्रोधित किया गया और उसे प्रह्लाद की ओर दौड़ाया गया।
हाथी पागलों की तरह प्रह्लाद की ओर दौड़ा। प्रह्लाद तब भी शांत बैठा था, अपनी आँखें बंद करके विष्णु का ध्यान कर रहा था। जैसे ही हाथी प्रह्लाद के पास पहुंचा, अचानक उसकी चाल धीमी हो गई। हाथी ने प्रह्लाद को सूंड से उठाया और उसे धीरे से जमीन पर रख दिया, जैसे वह कोई कीमती वस्तु हो। हाथी ने प्रह्लाद के चरणों में नमन किया और फिर शांति से वापस चला गया। यह विष्णु की कृपा का प्रमाण था, जिसने प्रह्लाद को हर खतरे से बचाया। नरसिंह भगवान ने अदृश्य रूप से प्रह्लाद के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना दिया था।
पहाड़ से पतन
हर प्रयास में विफल होने के बाद, हिरण्यकशिपु क्रोध से पागल हो गया। उसने प्रह्लाद को एक ऊंचे पहाड़ से नीचे फेंक देने का आदेश दिया। सैनिकों ने प्रह्लाद को पकड़ लिया और उसे पहाड़ की चोटी पर ले गए। वहां से नीचे की खाई गहरी और भयानक थी। प्रह्लाद को नीचे धकेल दिया गया।
प्रह्लाद 'विष्णु, विष्णु' जपते हुए नीचे गिरने लगा। गिरने के दौरान, भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उसे अपनी गोद में ले लिया। जब प्रह्लाद नीचे पहुंचा, तो उसे कोई चोट नहीं लगी। वह हँसते हुए भगवान विष्णु का धन्यवाद करने लगा। प्रह्लाद की अटूट भक्ति और विष्णु की कृपा ने उसे फिर से बचा लिया था। अब हिरण्यकशिपु समझ गया कि वह प्रह्लाद को सीधे तौर पर नहीं मार सकता। अब उसने एक और षड्यंत्र रचा - अपनी बहन होलिका की मदद लेना। अगले अध्याय में हम होलिका के असफल प्रयास के बारे में जानेंगे।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए अनेक प्रयास किए, जैसे कि उसे विष देना, हाथी से कुचलवाना और पहाड़ से फेंकना। हर बार प्रह्लाद की विष्णु भक्ति और भगवान की कृपा ने उसे बचा लिया। यह दिखाता है कि सच्ची भक्ति से भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
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