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नरसिंह अवतार कथा – अध्याय 6: नरसिंह का अवतार

Tilak Kathayein12 Apr 2026147 views📖 1 min read
नरसिंह अवतार कथा
नरसिंह अवतार कथा का अध्याय 6 — नरसिंह का अवतार। विष्णु नरसिंह के रूप में खंभे से प्रकट होते हैं, आधा मनुष्य और आधा सिंह, और हिरण्यकशिपु पर आक्रमण करते हैं।

नरसिंह का अवतार

पिछले अध्याय में, भगवान ने भक्तों की रक्षा करने और धर्म की स्थापना करने का संकल्प लिया था। प्रह्लाद की भक्ति और हिरण्यकशिपु के अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुके थे। सृष्टि में एक अद्भुत घटना घटने वाली थी, एक ऐसा अवतार जो पहले कभी नहीं हुआ था।

खंभे का चीत्कार

हिरण्यकशिपु का क्रोध सातवें आसमान पर था। प्रह्लाद को मारने के सारे प्रयास विफल हो चुके थे। उसके मंत्री भयभीत थे, सैनिक थर-थर कांप रहे थे, लेकिन हिरण्यकशिपु के अहंकार का बांध अभी भी टूटा नहीं था। उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को पकड़कर दरबार में लाया। उसकी आंखें लाल हो चुकी थीं, जैसे ज्वालामुखी फटने वाला हो। प्रह्लाद शांत भाव से अपने पिता के सामने खड़ा था, उसके मन में भगवान विष्णु के प्रति अटूट विश्वास था।

“ओ मूर्ख बालक! तू बार-बार कहता है कि तेरा भगवान हर जगह है। क्या वह इस खंभे में भी है?” हिरण्यकशिपु ने दहाड़ते हुए पूछा और अपनी गदा से खंभे पर प्रहार किया। “हाँ पिताश्री, वह यहाँ भी हैं,” प्रह्लाद ने बिना किसी भय के उत्तर दिया। हिरण्यकशिपु ने गुस्से में खंभे पर एक और प्रहार किया।

नरसिंह का प्राकट्य

उसी क्षण, एक प्रचंड गर्जना हुई। धरती कांप उठी, आकाश में बिजली कड़की, और खंभा फट गया। उस खंभे से एक अद्भुत प्राणी प्रकट हुआ – आधा नर और आधा सिंह। उसका शरीर मानव का था, लेकिन उसका मुख सिंह का था। उसकी आंखें जलती हुई आग की तरह थीं, और उसकी दहाड़ सुनकर तीनों लोकों में भय छा गया। यही थे भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार।

नरसिंह भगवान का प्राकट्य भक्तों के लिए आशा की किरण था। यह भगवान की उस प्रतिज्ञा का प्रमाण था कि वह अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। यह अवतार हिरण्यकशिपु के वरदान को विफल करने के लिए था, क्योंकि वह न ही पूरी तरह से मनुष्य था और न ही पशु। भगवान विष्णु की माया अपरंपार है; वे भक्तों को बचाने के लिए अद्भुत रूप धारण कर सकते हैं।

संध्याकाल में वध

नरसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया और उसे महल के द्वार पर ले गए। यह न दिन था, न रात – संध्याकाल था। उन्होंने हिरण्यकशिपु को अपनी जांघों पर रखा, जो न पृथ्वी थी, न आकाश। फिर उन्होंने अपने तीखे नाखूनों से हिरण्यकशिपु का सीना चीर दिया और उसका वध कर दिया। यह न घर के अंदर हुआ, न बाहर। हिरण्यकशिपु का अंत उसके कर्मों का फल था।

हिरण्यकशिपु का वध धर्म की विजय का प्रतीक था। नरसिंह भगवान का क्रोध शांत हो गया, और उन्होंने प्रह्लाद को आशीर्वाद दिया। वातावरण में शांति छा गई, और देवताओं ने पुष्प वर्षा की। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे नरसिंह भगवान का क्रोध शांत होता है और कैसे प्रह्लाद अपने राज्य में धर्म की स्थापना करता है।

अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में नरसिंह भगवान खंभे से प्रकट होते हैं और हिरण्यकशिपु का वध करते हैं। यह भगवान की शक्ति और भक्तों की रक्षा करने की उनकी प्रतिज्ञा का प्रतीक है। सच्ची भक्ति और अटूट विश्वास सभी बाधाओं को पार कर सकता है।

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आज का पंचांग 29 अगस्त 2026

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