दुर्गा सप्तशती कथा – अध्याय 5: शुम्भ-निशुम्भ की चुनौती | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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दुर्गा सप्तशती कथा – अध्याय 5: शुम्भ-निशुम्भ की चुनौती

Tilak Kathayein12 Apr 202638 views📖 1 min read
दुर्गा सप्तशती कथा
दुर्गा सप्तशती कथा का अध्याय 5 — शुम्भ-निशुम्भ की चुनौती। शुम्भ और निशुम्भ नामक दो शक्तिशाली असुर स्वर्ग पर आक्रमण करते हैं और देवी दुर्गा से युद्ध करने की चुनौती देते हैं।

शुम्भ-निशुम्भ की चुनौती

महिषासुर के अंत के साथ ही तीनों लोकों में शांति लौट आई थी। देवगण आनंदित थे, ऋषि-मुनि प्रसन्न थे। परन्तु, यह सुखद स्थिति अधिक समय तक नहीं टिक सकी। हिमालय की ऊंची चोटियों के पार, पाताल लोक में, दो शक्तिशाली असुर, शुम्भ और निशुम्भ, इस विजय की खबर सुनकर क्रोध से भर उठे। उनकी साम्राज्यवादी दृष्टि में, यह देवी का वर्चस्व एक चुनौती थी जिसे स्वीकार करना अनिवार्य था।

शुम्भ-निशुम्भ का क्रोधपूर्ण आह्वान

जैसे ही महिषासुर के वध की कहानी पाताल लोक तक पहुँची, शुम्भ का सिंहासन क्रोध से थर्रा उठा। उसका चेहरा लाल हो गया, उसकी आँखें आग उगलने लगीं। निशुम्भ, जो उससे भी अधिक क्रूर था, अपने भाई के बगल में खड़ा था, उसकी मुट्ठियाँ कसकर बंधी हुई थीं। दोनों भाइयों ने मिलकर अब तक अनगिनत युद्ध जीते थे और तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित करने का सपना देख रहे थे। एक स्त्री द्वारा महिषासुर का वध उनके अहंकार पर गहरी चोट थी।

“यह कैसी धृष्टता है!” शुम्भ दहाड़ा, उसकी आवाज पाताल लोक में गूंज उठी। “एक स्त्री, एक अबला, हमारे साम्राज्य को चुनौती देने का साहस करती है? निशुम्भ, यह अपमान असहनीय है। हमें तुरंत कार्यवाही करनी होगी। उस देवी को यहाँ लाओ, या उसे नष्ट कर दो! उसके सौन्दर्य और शक्ति का उपयोग हम अपने लाभ के लिए करेंगे।" निशुम्भ ने क्रूर मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "भ्राता, आपकी आज्ञा का पालन होगा। मैं अपनी सेना लेकर तुरंत प्रस्थान करता हूँ।"

देवी का अपमानजनक प्रस्ताव

शुम्भ-निशुम्भ की सेनाएं तीव्र गति से हिमालय की ओर बढ़ने लगीं। जब वे देवी दुर्गा के निवास स्थान, स्वर्गलोक पहुंचे, तो उन्होंने उन्हें एक दूत के माध्यम से एक संदेश भेजा। वह दूत, सुग्रीव नामक एक असुर था, जो वाक्पटु और निर्दयी था। सुग्रीव ने देवी दुर्गा के सामने पहुंचकर, घमंड से भरकर शुम्भ-निशुम्भ की ओर से एक अपमानजनक प्रस्ताव रखा।

“हे देवी!” सुग्रीव ने कहा, उसकी आवाज में व्यंग्य भरा हुआ था। “तुम कितनी सुंदर और शक्तिशाली हो! शुम्भ और निशुम्भ, तीनों लोकों के स्वामी, तुम्हारी सुंदरता से मोहित हो गए हैं। उन्होंने मुझे तुम्हें यह संदेश देने के लिए भेजा है कि तुम्हें स्वेच्छा से उनके साथ विवाह कर लेना चाहिए। वे तुम्हें अपनी पटरानी बनाकर अपने साम्राज्य की महारानी बनाएंगे। यदि तुम इनकार करती हो, तो वे तुम्हें युद्ध में बंदी बनाकर ले जाएंगे और तुम्हे उनकी दासी बनना होगा। अब तुम निर्णय लो!”

देवी दुर्गा शांत और स्थिर रहीं। उनके चेहरे पर जरा भी क्रोध या भय का भाव नहीं था। उन्होंने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "हे दूत, तुम्हारे स्वामी अज्ञानी हैं। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जो कोई भी मुझे युद्ध में हराएगा, मैं उसी से विवाह करूंगी। यदि शुम्भ और निशुम्भ मुझ पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, तो मैं उनकी दासी बनने को भी तैयार हूं।" देवी के वचन सुनकर सुग्रीव क्रोधित हो गया। उसे देवी से ऐसी प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी, परन्तु वह जानता था कि उसे अपने स्वामी को यह संदेश देना ही होगा। देवी मन ही मन मुस्कराईं, मानो वह जानती हों कि आगे क्या होने वाला है। महिषासुर का पतन तो मात्र एक आरंभ था।

असुरों द्वारा दूत प्रेषण

सुग्रीव, देवी के उत्तर से क्रोधित होकर शुम्भ-निशुम्भ के पास वापस लौटा और उन्हें सारा वृत्तांत सुनाया। देवी की चुनौती सुनकर शुम्भ का क्रोध और बढ़ गया। उसने तुरंत अपनी सेना को आक्रमण करने का आदेश दिया। शुम्भ-निशुम्भ दोनों ही अपनी विशाल सेना के साथ देवी दुर्गा को परास्त करने के लिए चल पड़े। वे अपने अपार बल और असुरों की अनगिनत सेना पर गर्व कर रहे थे। उन्हें विश्वास था कि देवी दुर्गा की शक्ति उनके सामने कुछ भी नहीं है।

लेकिन, शुम्भ और निशुम्भ अभी तक देवी दुर्गा की वास्तविक शक्ति से परिचित नहीं थे। वे नहीं जानते थे कि देवी दुर्गा आदि शक्ति हैं, जो ब्रह्मांड की रचना और विनाश करने में सक्षम हैं। देवी दुर्गा की कृपा से ही तीनों लोक सुरक्षित हैं। और इस बार, देवी दुर्गा अपनी भक्तों की रक्षा करने और असुरों का अंत करने के लिए युद्ध के मैदान में उतरने वाली थीं। देवी दुर्गा ने अपने दिव्य अस्त्र शस्त्रों को धारण किया और युद्ध के लिए तैयार हो गईं।

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने शुम्भ-निशुम्भ के क्रोध और देवी दुर्गा को चुनौती देने के उनके निर्णय के बारे में जाना। देवी दुर्गा ने असुरों के अपमानजनक प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और युद्ध की चुनौती स्वीकार की। यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि अहंकार और अभिमान का अंत विनाशकारी होता है, और सत्य एवं धर्म की विजय अवश्य होती है।

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