दुर्गा सप्तशती कथा – अध्याय 4: महिषासुर का अंत

महिषासुर का अंत
मधुकैटभ के वध के पश्चात, स्वर्गलोक में शांति का वास हुआ। परन्तु, यह शांति चिरस्थायी नहीं थी। धरती और स्वर्ग पर एक नया संकट मंडराने लगा था - महिषासुर का आतंक। उसने अपनी असुर शक्तियों से त्रिलोकी को त्रस्त कर रखा था, देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया था, और हर ओर हाहाकार मचा रखा था।
महिषासुर का आतंक
महिषासुर, भैंसे के रूप में एक विशालकाय असुर था। उसकी गर्जना से पृथ्वी कांप उठती थी और उसके पदचाप से पहाड़ दरक जाते थे। उसने इंद्रलोक पर कब्ज़ा कर लिया था, सूर्य, चंद्र, वायु और अग्नि के अधिकार छीन लिए थे। देवतागण भयभीत होकर इधर-उधर छिप रहे थे, असहाय और निराश। स्वर्ग की अप्सराएं कराह रही थीं, यज्ञ और हवन बंद हो गए थे, और धर्म का मार्ग अवरुद्ध हो गया था। महिषासुर का अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था, मानो कोई प्रलय आ गया हो। उसके सैनिक स्वर्ग में उत्पात मचा रहे थे, साधुओं को तंग कर रहे थे, और धरती को रक्त से रंग रहे थे।
इंद्र, देवताओं के राजा, व्याकुल होकर बोले, "यह कैसा दुर्भाग्य है! हमने अमृत पिया, परन्तु आज पराजय का विष पी रहे हैं। क्या कोई उपाय नहीं है इस असुर के आतंक से मुक्ति पाने का? कहाँ है हमारी शक्ति, हमारी तपस्या का फल?" देवताओं के ह्रदय में निराशा और भय का गहरा सागर उमड़ रहा था। उन्हें अपनी हार स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
देवताओं का दुर्गा का आह्वान
देवताओं ने मिलकर परमपिता ब्रह्माजी से प्रार्थना की। ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि महिषासुर को स्त्री के हाथों मरने का वरदान मिला हुआ है। तब देवताओं ने मिलकर आदि शक्ति, माँ दुर्गा का आह्वान करने का निश्चय किया। सभी देवताओं ने अपने तेज से एक अद्भुत शक्ति उत्पन्न की। भगवान विष्णु के तेज से एक अनुपम आभा निकली, शिवजी के तेज से एक त्रिशूल बना, इंद्र के तेज से वज्र और अग्निदेव के तेज से शक्ति उत्पन्न हुई। इस प्रकार सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य नारी, माँ दुर्गा का प्रादुर्भाव हुआ। वे सिंह पर सवार थीं, अठारह भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए थीं, और उनका मुखमंडल तेज से दमक रहा था।
माँ दुर्गा ने देवताओं को अभयदान देते हुए कहा, "हे देवगण, मैं जानती हूँ तुम्हारे दुःख का कारण। तुम निश्चिंत रहो, मैं तुम्हारी रक्षा के लिए आई हूँ। मैं महिषासुर का वध करूँगी और धर्म की स्थापना करूँगी।" उनकी वाणी सुनकर देवताओं के ह्रदय में आशा की किरण जगी। माँ दुर्गा की कृपा से उन्हें अपनी खोई हुई शक्ति वापस मिलने का विश्वास हुआ। उनका तेज और साहस लौट आया।
देवी और महिषासुर का युद्ध और वध
माँ दुर्गा ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर को ललकारा। भयंकर युद्ध छिड़ गया। माँ दुर्गा के सिंह ने असुरों के सेना दल को रौंद डाला। महिषासुर ने भैंसे के रूप में अपनी विशालकाय शक्ति का प्रदर्शन किया, परंतु माँ दुर्गा के तेज के आगे वह शक्ति फीकी पड़ गई। माँ दुर्गा ने अपने अस्त्रों से महिषासुर पर प्रहार करना शुरू किया। त्रिशूल, चक्र, तलवार और बाणों की वर्षा से असुर सेना में हाहाकार मच गया। महिषासुर बार-बार रूप बदलता रहा - कभी भैंसा, कभी सिंह, कभी मनुष्य, कभी हाथी! परन्तु माँ दुर्गा ने हर रूप में उसे परास्त किया। अंत में, माँ दुर्गा ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध कर दिया। उसका मृत शरीर धरती पर गिर गया, और देवताओं ने जय-जयकार किया।
माँ दुर्गा की जय! उन्होंने धर्म की रक्षा की, देवताओं को स्वर्ग वापस लौटाया, और पृथ्वी पर शांति स्थापित की। उनकी शक्ति का कोई अंत नहीं है। जो भी माँ दुर्गा की सच्चे मन से आराधना करता है, उसे अवश्य ही सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। माँ दुर्गा की कृपा सदैव अपने भक्तों पर बनी रहती है। उनके आशीर्वाद से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सत्य की विजय होती है।
आगे की कथा
महिषासुर के वध के बाद देवताओं ने माँ दुर्गा की स्तुति की और उन्हें धन्यवाद दिया। स्वर्गलोक फिर से देवताओं के अधिकार में आ गया, परन्तु यह शांति अस्थायी थी। अभी भी असुरों का वर्चस्व समाप्त नहीं हुआ था। शुम्भ और निशुम्भ नामक दो और शक्तिशाली असुर थे, जो माँ दुर्गा को चुनौती देने के लिए तैयार थे। अब देखना यह है कि माँ दुर्गा शुम्भ और निशुम्भ का सामना कैसे करती हैं और धर्म की स्थापना कैसे करती हैं।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने महिषासुर के आतंक और माँ दुर्गा द्वारा उसके वध की कथा पढ़ी। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली हो, सत्य और धर्म की हमेशा विजय होती है। माँ दुर्गा की आराधना करके हम अपने जीवन के सभी कष्टों को दूर कर सकते हैं।
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