दुर्गा सप्तशती कथा – अध्याय 8: शुम्भ-निशुम्भ का वध | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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दुर्गा सप्तशती कथा – अध्याय 8: शुम्भ-निशुम्भ का वध

Tilak Kathayein12 Apr 202663 views📖 1 min read
दुर्गा सप्तशती कथा
दुर्गा सप्तशती कथा का अध्याय 8 — शुम्भ-निशुम्भ का वध। देवी दुर्गा शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध करती हैं और अंत में उनका वध करके देवताओं को स्वर्ग वापस दिलाती हैं।

शुम्भ-निशुम्भ का वध

रक्तबीज के विनाश के बाद, दानवों की सेना में हाहाकार मच गया था। फिर भी, शुम्भ और निशुम्भ, अपनी शक्ति के अभिमान में चूर, युद्ध के मैदान में डटे रहे। उन्हें अभी भी अपनी विजय का अटूट विश्वास था, मानो रक्तबीज का वध उनके लिए एक मामूली बाधा हो। अब महाशक्ति दुर्गा के साथ अंतिम निर्णायक युद्ध होने वाला था, जिसके परिणाम पर स्वर्ग और पाताल दोनों की नियति निर्भर थी।

शुम्भ का क्रोध

रक्तबीज के वध का समाचार सुनकर शुम्भ का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसकी आँखें जलते अंगारे की तरह लाल हो गयीं। उसने अपने शक्तिशाली होंठों को भींचकर एक गहरी सांस ली, मानो अपनी सारी शक्ति को एकत्रित कर रहा हो। उस क्षण, उसका रूप और भी भयानक लगने लगा, जैसे साक्षात काल का प्रतीक हो। चारों ओर सन्नाटा छा गया था, मानो प्रकृति भी उसके क्रोध से भयभीत हो उठी हो।

“यह क्या सुन रहा हूँ मैं? रक्तबीज मारा गया? उस देवी ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है! आज मैं स्वयं उस अविनाशी गर्विता का मान मर्दन करूँगा! उसे दिखा दूँगा कि शुम्भ के क्रोध का क्या अर्थ होता है! आज या तो मैं रहूँगा, या वह!" शुम्भ ने गरजते हुए कहा।

निशुम्भ का आक्रमण

शुम्भ के आदेश पर निशुम्भ अपनी विशाल सेना के साथ देवी दुर्गा की ओर बढ़ा। उसके रथ के पहियों की गड़गड़ाहट, सैनिकों के चीत्कार, और हथियारों की झनझनाहट से धरती काँप उठी। निशुम्भ स्वयं एक भयानक योद्धा था, उसकी भुजाएँ विशाल और पेशियाँ फौलादी थीं। उसने एक विशाल गदा उठाई, जिसे घुमाते हुए वह देवी की ओर झपटा, मानो प्रलय का दूत हो। देवी दुर्गा शांत और स्थिर खड़ी थीं, मानो उनके सामने यह सेना एक तुच्छ बाधा हो।

देवी दुर्गा ने सिंह पर सवार होकर निशुम्भ के आक्रमण को विफल कर दिया। उन्होंने अपने धनुष से तीक्ष्ण बाणों की वर्षा की, जिससे दानवों की सेना में भगदड़ मच गई। उनके चक्र ने निशुम्भ के कई सैनिकों को काट डाला, और उनकी तलवार बिजली की गति से चमक रही थी। देवी का तेज इतना प्रचंड था कि निशुम्भ को भी पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। "हे असुर! तू कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, तू मुझ से नहीं जीत सकता। ये संसार धर्म का है, अधर्म का नहीं!", देवी ने सिंहनाद करते हुए कहा।

शुम्भ का वध

निशुम्भ के पराजित होने पर शुम्भ स्वयं युद्ध में उतरा। वह देवी के सामने खड़ा हो गया, उसकी आँखों में अहंकार और क्रोध का मिश्रण था। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा हुई और धरती काँपने लगी। देवी ने अपने त्रिशूल से शुम्भ पर प्रहार किया, लेकिन उसने उसे अपनी गदा से रोक दिया, फिर देवी ने अपने चक्र से शुम्भ के हृदय पर प्रहार किया, जिससे वह धराशायी हो गया। शुम्भ का वध होते ही तीनों लोकों में शांति छा गई। देवताओं ने पुष्प वर्षा की और गन्धर्वों ने मधुर संगीत गाया। देवी दुर्गा ने धर्म की स्थापना की और असुरों का नाश किया।

शुम्भ के वध के साथ ही असुरों का आतंक समाप्त हो गया। चारों ओर शांति और समृद्धि फैल गई। देवी दुर्गा ने अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया और कहा कि जो भी सच्चे मन से उनकी आराधना करेगा, वह हमेशा सुरक्षित रहेगा। अब देवी अपने भक्तों को आशीर्वाद देने और संसार को शांति प्रदान करने के लिए तैयार थीं। अगला अध्याय देवी के आशीर्वाद और इस कथा के समापन के बारे में बताएगा।

अध्याय 8 का सार: इस अध्याय में शुम्भ और निशुम्भ का देवी दुर्गा के हाथों वध होता है। यह दिखाता है कि अहंकार और बुराई का अंत निश्चित है और धर्म की हमेशा जीत होती है। यह अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए और अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

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