दुर्गा सप्तशती कथा – अध्याय 7: रक्तबीज का विनाश

रक्तबीज का विनाश
चण्ड और मुण्ड के संहार के बाद, देवों में आनंद की लहर दौड़ पड़ी। माँ दुर्गा की शक्ति और उनके क्रोध को देखकर सभी आश्चर्यचकित थे, लेकिन संकट अभी टला नहीं था। असुरों की विशाल सेना, रक्तबीज के नेतृत्व में, अभी भी युद्ध के मैदान में डटी हुई थी, और रक्तबीज तो मानो साक्षात मृत्यु का रूप धारण करके ही आया था।
रक्तबीज का भीषण आक्रमण
चण्ड मुण्ड की मृत्यु से रक्तबीज क्रोध से पागल हो उठा। उसके नेत्र लाल हो गए और शरीर से ज्वाला निकलने लगी। उसने गर्जना करते हुए अपनी सेना को आक्रमण का आदेश दिया। असुरों का दल सिंहनाद करते हुए माँ दुर्गा और उनकी सहायिकाओं पर टूट पड़ा। तलवारें हवा में चमक रही थीं, बाणों की वर्षा हो रही थी, और युद्ध का मैदान रक्त और मांस से भर गया। रक्तबीज स्वयं अपने रथ पर सवार होकर माँ दुर्गा की ओर बढ़ा, उसके हाथ में एक विशाल गदा थी जिससे वह प्रहार कर रहा था और हर प्रहार से धरती काँप रही थी। उसकी भीषण गर्जना से तीनों लोक थर्रा उठे।
रक्तबीज के हृदय में अहंकार हिलोरें मार रहा था। "कौन है यह देवी जो मेरे सामने खड़ी है? क्या वह मेरे रक्त के एक बूंद से उत्पन्न होने वाली सेना का सामना कर सकती है? उसे क्या पता कि मैं कितना शक्तिशाली हूँ?" उसने अपने मन में सोचा, अट्टहास करते हुए। "आज मैं इस देवी का अंत कर दूंगा और फिर से स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लूंगा।"
माँ काली का प्राकट्य
रक्तबीज के प्रहारों को विफल करते हुए, माँ दुर्गा ने देखा कि उसके रक्त की हर बूंद जमीन पर गिरते ही एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो रहा है। पल भर में, युद्ध का मैदान अनगिनत रक्तबीजों से भर गया, हर एक पहले से कहीं अधिक भयंकर और शक्तिशाली। देवों में निराशा छा गई, और वे समझ गए कि इस राक्षस को हराना असंभव है। माँ दुर्गा को भी यह स्थिति अत्यंत विकट लगी। तब, उन्होंने अपने क्रोध को एकत्रित किया और एक भयानक रूप धारण किया। उनके ललाट से एक तेज प्रकाश निकला और उस प्रकाश से माँ काली प्रकट हुईं।
माँ काली का रूप भयावह था। उनकी आँखें क्रोध से लाल थीं, जिह्वा बाहर निकली हुई थी और गले में मुंडों की माला थी। उन्होंने अपने हाथों में खड्ग और खप्पर धारण किए हुए थे। उनका रूप ऐसा था कि काल भी उनसे डरता था। माँ दुर्गा ने उन्हें आदेश दिया, "काली! तुम इस रक्तबीज का रक्तपान करो और उसकी उत्पत्ति को ही नष्ट कर दो। उसे एक भी बूंद धरती पर गिरने मत देना।" माँ काली "जै माँ" के उद्घोष से आकाश गुंजाते हुए रक्तबीज पर झपटीं।
रक्तबीज का संहार
माँ काली ने रक्तबीज पर आक्रमण कर दिया। जैसे ही माँ दुर्गा रक्तबीज पर अपने अस्त्रों से प्रहार करतीं और उसका रक्त धरती पर गिरता, माँ काली अपनी विशाल जीभ फैलाकर उस रक्त को पी जातीं। इस प्रकार, रक्तबीज के रक्त से नए रक्तबीज उत्पन्न होने से पहले ही नष्ट हो जाते। रक्तबीज हतप्रभ रह गया। उसकी शक्ति क्षीण होती गई और अंत में, माँ काली ने अपने खड्ग से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। उसके गिरते हुए सिर को भी उन्होंने अपने खप्पर में पकड़ लिया और उसका अंतिम रक्त भी पी लिया। इस प्रकार, रक्तबीज का विनाश हुआ।
माँ काली, जिन्होंने राक्षसों के रक्त से अपनी प्यास बुझाई थी, थोड़ी देर के लिए उसी भयानक रूप में रणभूमि में नृत्य करने लगीं। देवताओं ने उनकी स्तुति की, और उनकी जय-जयकार से आकाश गुंजायमान हो उठा। माँ दुर्गा ने अपनी कृपा से माँ काली को शांत किया और उन्हें फिर से अपने में समाहित कर लिया। असुरों की सेना रक्तबीज के अंत के साथ ही भाग खड़ी हुई। देवताओं ने राहत की सांस ली। लेकिन अभी भी दो महादानव शेष थे - शुम्भ और निशुम्भ।
अध्याय 7 का सार: इस अध्याय में हमने रक्तबीज के अद्भुत वरदान और उसके विनाश को देखा। माँ दुर्गा ने काली रूप धारण करके रक्तबीज का वध किया। यह अध्याय हमें सिखाता है कि अहंकार और बुरी शक्तियों का अंत निश्चित है, और देवी दुर्गा हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।
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