देवी की कथाएँ

सीता कथा – अध्याय 3: राम का आगमन, प्रतियोगिता

Tilak Kathayein12 Apr 202675 views📖 1 min read
सीता कथा
सीता कथा का अध्याय 3 — राम का आगमन, प्रतियोगिता। राम विश्वामित्र के साथ जनकपुर पहुंचते हैं और शिव धनुष तोड़ने की प्रतियोगिता में भाग लेते हैं।

राम का आगमन, प्रतियोगिता

सीता के बाल्यकाल की अद्भुत लीलाओं के पश्चात, मिथिला नगरी में स्वयंवर की तैयारियां ज़ोरों पर थीं। राजा जनक ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए एक कठिन प्रतिज्ञा रखी थी, जिसने दूर-दूर के राजकुमारों और वीरों को जनकपुर आमंत्रित किया था। यह प्रतिज्ञा थी भगवान शिव के उस दिव्य धनुष को उठाने की, जिसे परशुराम ने राजा जनक के पूर्वजों को सौंपा था।

जनकपुर में शुभ आगमन

सूर्य अपनी स्वर्णिम किरणों से जनकपुर को नहला रहा था, तभी अयोध्या से विश्वामित्र मुनि के साथ राम और लक्ष्मण ने जनकपुर में प्रवेश किया। राम का शांत और तेजस्वी मुखमंडल सभी को आकर्षित कर रहा था। उनके साथ लक्ष्मण की अटूट निष्ठा और सेवाभाव भी सभी को मोहित कर रहा था। जनकपुर के लोग दोनों राजकुमारों के रूप- सौंदर्य और तेज से चकित हो गए। हर कोई अनुमान लगा रहा था कि क्या ये राजकुमार शिव धनुष को उठाने में सक्षम होंगे।

विश्वामित्र मुनि ने राजा जनक को राम और लक्ष्मण के आगमन की सूचना दी। राजा जनक ने आदरपूर्वक मुनि विश्वामित्र और दोनों राजकुमारों का स्वागत किया। "मुनिवर, आपका आगमन हमारे लिए सौभाग्य की बात है। इन तेजस्वी राजकुमारों का परिचय प्राप्त कर मैं धन्य हुआ," राजा जनक ने कहा। राम ने विनम्रता से उत्तर दिया, "हम आपके आतिथ्य से कृतज्ञ हैं, राजन। हम यहाँ आपके यज्ञ में भाग लेने और आपके दर्शन करने आए हैं।"

शिव धनुष का प्रदर्शन

स्वयंवर सभा में भारी भीड़ थी। विभिन्न राज्यों के राजकुमार और राजा, सभी अपनी शक्ति और वीरता का प्रदर्शन करने के लिए उत्सुक थे। सबसे पहले कई शक्तिशाली राजकुमारों ने शिव धनुष को उठाने का प्रयास किया, लेकिन वे असफल रहे। कुछ ने तो प्रयास करते ही अपनी शक्ति खो दी और मूर्छित हो गए। शिव धनुष, जो सोने और रत्नों से जड़ा हुआ था, अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ, मानो वह किसी अजेय शक्ति से बंधा हो। राजा जनक निराश हो गए। उनकी निराशा भरी वाणी सभा में गूंजी, "क्या कोई वीर नहीं है जो इस धनुष को उठा सके? क्या सीता बिना वर के ही रह जाएगी?"

सीता, जो अपनी सखियों के साथ एक ऊँचे मंडप पर बैठी थीं, अपने हृदय में राम के प्रति एक अद्भुत आकर्षण महसूस कर रही थीं। उन्हें विश्वास था कि राम ही उस धनुष को भंग करने में सक्षम हैं। सीता ने मन ही मन भगवान शिव से प्रार्थना की, "हे भोलेनाथ, मेरी लाज रखना और राम को विजयी बनाना। मेरी भक्ति स्वीकार करो और उन्हें शक्ति दो।" उनकी प्रार्थना में अपार श्रद्धा और विश्वास था, जिसने राम को आशीर्वाद दिया। सीता की आँखों में एक दिव्य आभा थी, जैसे वे जानती हों कि राम ही वह वीर हैं जो इस असंभव कार्य को संभव कर सकते हैं।

राम द्वारा धनुष भंग

विश्वामित्र मुनि की आज्ञा पाकर राम उठे और शिव धनुष की ओर बढ़े। उन्होंने धनुष को प्रणाम किया और बड़ी सहजता से उसे उठा लिया। सभा में सन्नाटा छा गया। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि एक किशोर राजकुमार इतनी आसानी से उस धनुष को उठा सकता है, जिसे बड़े-बड़े वीर भी हिला नहीं सके थे। फिर, पलक झपकते ही, राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई। जैसे ही उन्होंने प्रत्यंचा खींची, भयंकर गर्जना के साथ धनुष दो टुकड़ों में टूट गया! धनुष के टूटने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरी सभा काँप उठी।

सीता की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। उनकी प्रार्थना स्वीकार हो गई थी। राम ने शिव धनुष को भंग कर दिया था, और वे जानती थीं कि अब उनका विवाह राम से निश्चित है। सीता के हृदय में राम के प्रति प्रेम और श्रद्धा का सागर उमड़ पड़ा। देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की, और जनकपुर में आनंद और उत्सव का माहौल छा गया। राजा जनक की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने घोषणा की कि सीता का विवाह राम से होगा।

अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में राम का जनकपुर आगमन, शिव धनुष का प्रदर्शन और राम द्वारा धनुष भंग का वर्णन है। यह घटना राम की शक्ति और सीता की भक्ति का प्रमाण है, यह दर्शाता है कि सच्चे प्रेम और श्रद्धा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

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