दुर्गा सप्तशती कथा – अध्याय 3: मधुकैटभ का वध

मधुकैटभ का वध
पिछले अध्याय, देवी माहात्म्य: ज्ञान की खोज, में हमने जाना कि किस प्रकार महाराजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य ने भगवती महामाया की शरण ली और उनके प्रभाव को समझा। अब, हम उस कथा को आगे बढ़ाते हैं, जहाँ भगवती महामाया के प्रादुर्भाव से संसार किस प्रकार राक्षसों के संहार से मुक्त हुआ, इसका वर्णन है। यह कथा मधुकैटभ के वध की है, जो तमोगुण के प्रतीक थे।
विष्णु की योगनिद्रा
प्रलयकाल के उपरांत, जब सारा संसार जलमग्न था, भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में लीन थे। उनकी नाभि से एक कमल निकला, जिस पर ब्रह्मा जी विराजमान थे। ब्रह्मा जी उस निर्जन जलराशि को देखकर विस्मित थे, उन्हें सृष्टि के रहस्य का ज्ञान नहीं था, वे अपने जन्म का कारण जानने के लिए उत्सुक थे। चारों ओर केवल जल ही जल था, और भगवान विष्णु गहरी निद्रा में मग्न थे, मानो युगों का भार उनकी पलकों पर टिका हो। एकाकीपन और जिज्ञासा से ब्रह्मा जी का हृदय व्याकुल था।
ब्रह्मा जी ने मन ही मन सोचा, "यह कैसा अद्भुत रहस्य है! मैं कौन हूँ? यह जल कहाँ से आया? और यह विशाल पुरुष कौन है जो निद्रा में लीन हैं? मुझे इस सृष्टि के रहस्य को जानना ही होगा।" उन्होंने भगवान विष्णु को जगाने का प्रयास किया, परन्तु उनकी तपस्या से विष्णु की निद्रा और भी गहरी होती गई।
मधु और कैटभ का जन्म
जब ब्रह्मा जी सृष्टि के रहस्य को जानने के लिए चिंतित थे, तभी भगवान विष्णु के कानों के मैल से दो भयंकर असुरों का जन्म हुआ – मधु और कैटभ। वे दोनों अत्यंत बलशाली और क्रूर थे, और जन्म लेते ही ब्रह्मा जी को मारने के लिए दौड़ पड़े। उनका उद्देश्य था ब्रह्मा जी को मारकर सृष्टि के कार्य को रोकना और संसार पर अपना आधिपत्य स्थापित करना। उनकी गर्जना से तीनों लोक काँप उठे, और ऐसा लगा जैसे प्रलय फिर से आ गई हो।
ब्रह्मा जी भयभीत होकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे, "हे जगदीश्वर, हे महामाया, मेरी रक्षा करो! इन असुरों से सृष्टि को बचाओ! आपके सिवा इस संकट से कौन मुक्ति दिला सकता है?" ब्रह्मा जी की पुकार सुनकर, भगवती महामाया, जो भगवान विष्णु की योगनिद्रा थीं, प्रकट हुईं। उन्होंने भगवान विष्णु की आँखें खोल दीं।
देवी द्वारा राक्षसों का वध
भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ को देखा, और तुरंत उनसे घोर युद्ध करने लगे। यह युद्ध पाँच हजार वर्षों तक चला, परन्तु मधु और कैटभ भगवान विष्णु से पराजित नहीं हुए। वे दोनों असुर अपनी शक्ति और वीरता के मद में चूर थे। तब भगवान विष्णु ने भगवती महामाया की स्तुति की, जिन्होंने असुरों को मोहित कर दिया। मोहान्ध होकर मधु और कैटभ ने भगवान विष्णु से कहा, "हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं, वर माँगो।"
भगवान विष्णु ने उत्तर दिया, "यदि तुम प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथों से मारे जाओ।" यह सुनकर असुरों को आश्चर्य हुआ, परन्तु भगवती महामाया की माया के कारण वे सत्य को समझ नहीं पाए। असुरों ने कहा, "तथास्तु!" तब भगवान विष्णु ने उन दोनों को अपनी जांघों पर रखकर उनका सिर काट दिया। इस प्रकार, भगवती महामाया की कृपा से भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ का वध किया, और सृष्टि को भय से मुक्त किया। भगवान विष्णु ने असुरों के शरीर से निकले मेद (वसा) से पृथ्वी को भर दिया, इसलिए पृथ्वी का नाम "मेदिनी" भी पड़ा।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार भगवान विष्णु ने भगवती महामाया की कृपा से मधु और कैटभ जैसे भयंकर असुरों का वध किया। इसका आध्यात्मिक तात्पर्य यह है कि तमोगुण पर विजय पाने के लिए हमें भगवान की शरण लेनी चाहिए। यह अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है, और भगवती की शरण में ही मुक्ति है। अब, अगले अध्याय में हम महिषासुर के अंत की कथा जानेंगे।
आज का पंचांग 29 अगस्त 2026
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