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देवी भागवत पुराण – अध्याय 4: शुम्भ-निशुम्भ का शासन

Tilak Kathayein13 Apr 202675 views📖 1 min read
देवी भागवत पुराण
देवी भागवत पुराण का अध्याय 4 — शुम्भ-निशुम्भ का शासन। महिषासुर के वध के बाद, शुम्भ और निशुम्भ नामक दो असुरों का अत्याचार देवताओं पर बढ़ता है।

शुम्भ-निशुम्भ का शासन

महिषासुर के अंत के साथ देवताओं ने चैन की सांस ली थी, पर यह शांति क्षणभंगुर थी। सृष्टि के चक्र में सुख और दुख, जय और पराजय, बारी-बारी से आते हैं। अभी देवताओं का विजयोल्लास शांत भी नहीं हुआ था कि एक नए संकट के बादल मंडराने लगे, एक ऐसा संकट जो महिषासुर से भी अधिक भयानक था।

असुर भाइयों का उदय

हिमालय की दुर्गम कंदराओं में, घोर तपस्या में लीन दो असुर भाई अपने बल को बढ़ाने में जुटे थे। उनका नाम था शुम्भ और निशुम्भ। वे दोनों क्रूर और शक्तिशाली थे, उनकी आँखों में ब्रह्मांड को जीतने की भूख थी। उनके शरीर वज्र के समान कठोर थे, और उनकी गर्जना से पर्वत भी कांप उठते थे। उनकी आराधना से वायुमंडल में एक भयानक ऊर्जा का संचार हो रहा था, मानों प्रकृति भी किसी विनाशकारी घटना की आशंका से भयभीत हो रही हो।

"निशुम्भ, मेरी तपस्या सफल हो रही है। जल्द ही हम देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित करेंगे," शुम्भ ने अपने भाई से कहा। निशुम्भ ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से शुम्भ की ओर देखा और उत्तर दिया, "भ्राता, मुझे पूर्ण विश्वास है कि हम तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित करेंगे। देवताओं को अपनी दासता स्वीकार करनी होगी अन्यथा उनका विनाश निश्चित है।" उनके हृदय में देवताओं के प्रति द्वेष की अग्नि प्रज्वलित हो रही थी, और उस द्वेष की ज्वाला में वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भस्म करने के लिए तत्पर थे।

देवताओं पर अत्याचार

ब्रह्माजी से अद्वितीय वरदान प्राप्त करने के पश्चात, शुम्भ और निशुम्भ का आतंक तीनों लोकों में छा गया। उन्होंने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया, इंद्र को सिंहासन से भगा दिया, और वरुण, कुबेर, यम, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को अपने चरणों में झुकने पर विवश कर दिया। देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई, वे निराश्रित होकर इधर-उधर भटकने लगे। यज्ञों का अनुष्ठान बंद हो गया, वेदमंत्रों का उच्चारण थम गया, और सम्पूर्ण स्वर्गलोक असुरों के अत्याचार से कराह उठा। देवताओं के आभूषण छीन लिए गए, उनके शस्त्र उनसे छीन लिए गए, और उन्हें दास की भांति रहने पर विवश कर दिया गया।

देवतागण भयभीत होकर इधर-उधर शरण ढूंढ रहे थे। उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से सहायता की गुहार लगाई। अंत में, देवर्षि नारद ने उन्हें हिमालय पर्वत पर स्थित देवी के स्थान पर जाकर प्रार्थना करने का सुझाव दिया। नारदजी ने कहा, "देवताओं, केवल देवी ही इस संकट से तुम्हें मुक्ति दिला सकती हैं। वे आदि शक्ति हैं, वे ही इस ब्रह्मांड की रक्षक हैं। उनके चरणों में शरण लो, वे अवश्य तुम्हारी रक्षा करेंगी।" देवताओं को नारदजी के वचनों में आशा की किरण दिखाई दी, और वे तुरंत हिमालय की ओर चल पड़े।

देवी से प्रार्थना

हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच, देवताओं ने देवी की स्तुति शुरू कर दी। उन्होंने अपने हृदय की गहराइयों से मां दुर्गा का आह्वान किया। उनकी स्तुति से सम्पूर्ण वातावरण गुंजायमान हो गया, और देवी प्रकट हुईं, वह तेज और सौंदर्य का अद्भुत संगम थीं। देवताओं ने देवी को शुम्भ और निशुम्भ के अत्याचारों के बारे में बताया और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना की। उनकी करुण पुकार सुनकर देवी का हृदय द्रवित हो गया। देवी ने आश्वासन दिया, "देवताओं, धैर्य रखो। मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूंगी। मैं इन असुरों का अंत करने के लिए शीघ्र ही अवतार लूंगी।"

देवी की वाणी में अद्भुत शक्ति थी। देवताओं के मन का भय दूर हो गया और उनमें नई ऊर्जा का संचार हुआ। देवी ने कहा, "मैं कौशिकी के रूप में प्रकट होकर इन दुष्टों का नाश करूंगी।" देवी के मुख से निकले ये शब्द, एक नए अध्याय की शुरुआत थे, एक ऐसे अध्याय की जिसमें असुरों का अंत निश्चित था। देवी का संकल्प अटल था, और देवताओं को पूर्ण विश्वास था कि अब उनका उद्धार अवश्य होगा।

अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में, शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों के उदय और उनके अत्याचारों का वर्णन है। देवताओं की दुर्दशा और देवी से की गई प्रार्थना का वर्णन यह दर्शाता है कि जब धर्म पर संकट आता है, तो आदि शक्ति हमेशा अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होती हैं। यह अध्याय अगले अध्याय की भूमिका तैयार करता है, जिसमें देवी कौशिकी के रूप में प्रकट होकर शुम्भ और निशुम्भ का वध करेंगी।

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