देवी भागवत पुराण – अध्याय 1: दुर्गा का उत्पत्ति कथा

दुर्गा का उत्पत्ति कथा
पिछले अध्याय में हमने देवताओं और असुरों के बीच हुए भीषण संग्राम का वर्णन सुना। देवराज इंद्र अपनी शक्ति खो चुके थे और त्राहिमाम, त्राहिमाम कर रहे थे। अब हम उस अद्वितीय शक्ति के प्रादुर्भाव की कथा में प्रवेश करते हैं, जो देवताओं को बचाने और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए प्रकट हुई।
देवताओं का शक्ति के लिए आह्वान
स्वर्गलोक में भय का वातावरण था। महिषासुर के अत्याचार से त्रस्त देवता, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए एकत्रित हुए। उनके मुख पर निराशा और हृदय में भय था। वे जानते थे कि महिषासुर को साधारण शक्ति से पराजित नहीं किया जा सकता। उसका बल अभूतपूर्व था और उसे किसी दिव्य शक्ति के द्वारा ही रोका जा सकता था। सभी देवता एक साथ मिलकर उस परम शक्ति का आह्वान करने के लिए तत्पर थे, एक ऐसी शक्ति जो तीनों लोकों को संतुलन प्रदान कर सके।
ब्रह्मा जी ने शांत स्वर में कहा, "हे देवगण, अब एक ही मार्ग है। हमें आदिशक्ति की आराधना करनी होगी। वही इस संकट से हमें मुक्ति दिला सकती हैं।" विष्णु जी ने समर्थन करते हुए कहा, "ब्रह्मा जी सत्य कह रहे हैं। हमें अपनी समस्त शक्ति और भक्ति से देवी का आह्वान करना होगा।" महादेव गंभीर स्वर में बोले, "तो फिर विलंब कैसा? आइये, हम सब मिलकर उस परम् ज्योति का ध्यान करें, जो अखिल ब्रह्माण्ड की जननी हैं।"
दुर्गा का दिव्य प्रादुर्भाव
तीनों लोकों के देवताओं ने एक साथ मिलकर आदिशक्ति का ध्यान किया। उनके सम्मिलित तेज से एक अद्भुत ज्योति उत्पन्न हुई। उस ज्योति से एक दिव्य नारी का प्रादुर्भाव हुआ, जो सहस्त्र सूर्यों के समान तेजस्वी थीं। उनके दस भुजाएँ थीं, जिनमें विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र सुशोभित थे। उनका मुखमंडल शांत और करुणामय था, परंतु उनकी आँखों में अन्याय के प्रति प्रचंड क्रोध की ज्वाला धधक रही थी। वे साक्षात दुर्गा थीं, महिषासुर मर्दिनी, जो धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुई थीं।
जैसे ही देवी दुर्गा प्रकट हुईं, संपूर्ण ब्रह्माण्ड में आनंद की लहर दौड़ गई। देवताओं के चेहरे खिल उठे। उन्हें विश्वास हो गया कि अब उनका भय दूर होगा और धर्म की पुनर्स्थापना होगी। देवी दुर्गा ने अपना आशीर्वाद देते हुए कहा, "हे देवगण, भयभीत मत हो। मैं तुम सबकी रक्षा के लिए यहाँ आई हूँ। मैं महिषासुर का वध कर धर्म की स्थापना करूंगी। तुम सब निश्चिंत रहो।" देवी के वचनों से देवताओं के हृदय में साहस का संचार हुआ।
महिषासुर का अत्याचार वर्णन
महिषासुर के अत्याचारों की सीमा नहीं थी। उसने स्वर्गलोक पर अपना आधिपत्य जमा लिया था और देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया था। पृथ्वी पर उसने हाहाकार मचा रखा था। ऋषि-मुनियों को यज्ञ करने से रोका जाता था और निर्दोष लोगों पर अत्याचार किए जाते थे। धर्म का नाश हो रहा था और अधर्म का बोलबाला था। महिषासुर अपने असीम शक्ति के मद में अंधा हो चुका था। उसे यह आभास भी नहीं था कि उसका अंत निकट है।
महिषासुर के अत्याचार से त्रस्त धरती माता का करुण स्वर देवताओं के कानों तक पहुंचा। यह सुनकर देवी दुर्गा का क्रोध और भी बढ़ गया। उन्होंने अपने वाहन सिंह की ओर देखा, जो उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए तत्पर था। देवी दुर्गा जानती थीं कि अब महिषासुर के साथ युद्ध अवश्यंभावी है और उन्हें धर्म की रक्षा के लिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना होगा। अगले ही क्षण उन्होंने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।
अध्याय 1 का सार: देवताओं ने महिषासुर के अत्याचारों से पीड़ित होकर आदिशक्ति का आह्वान किया। उनकी प्रार्थना सुनकर देवी दुर्गा का दिव्य प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने देवताओं को अभयदान दिया और महिषासुर का वध करने का संकल्प लिया। यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि जब धर्म पर संकट आता है, तो दिव्य शक्ति अवश्य ही प्रकट होती है और भक्तों की रक्षा करती है।
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