रामायण – अध्याय 5: मैत्री और खोज

मैत्री और खोज
माता सीता के हरण से व्याकुल श्रीराम और लक्ष्मण, दंडक वन में सीता की खोज में भटक रहे थे। उनका हृदय पीड़ा से भरा था, परन्तु उन्हें विश्वास था कि वे अवश्य ही सीता को ढूंढ निकालेंगे। निराशा के क्षणों में भी, भगवान राम अपनी मर्यादा और धैर्य को बनाए रखे हुए थे, और लक्ष्मण उनका सहारा बने रहे।
हनुमान से भेंट
ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़ते हुए, राम और लक्ष्मण को एक तेजस्वी वानर आते हुए दिखाई दिया। वह हनुमान थे, जो सुग्रीव के सेवक थे। हनुमान अपने स्वामी सुग्रीव के भय को दूर करने के लिए राम के पास भेजे गए थे। हनुमान ने राम और लक्ष्मण को साधारण वेश में देखा, परन्तु उनके तेज से वे समझ गए कि ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। उनकी वाणी में विनम्रता और मुख पर दिव्यता थी।
हनुमान ने दोनों भाइयों के चरणों में प्रणाम किया और आदरपूर्वक कहा, "हे प्रभु! मैं हनुमान हूँ, सुग्रीव का सेवक। मेरे स्वामी आपसे मित्रता करने के इच्छुक हैं। कृपया बताइए आप कौन हैं और इस वन में किस कारण से आए हैं?" राम ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे हनुमान! मैं राम हूँ, और ये मेरे भाई लक्ष्मण हैं। मेरी पत्नी सीता का रावण ने हरण कर लिया है, और हम उसी की खोज में भटक रहे हैं।"
हनुमान राम की करुणा से भरे शब्दों को सुनकर भावविभोर हो गए। उन्होंने राम को सुग्रीव के बारे में बताया, कि सुग्रीव भी अपने भाई बालि द्वारा राज्य से निष्कासित कर दिए गए हैं, और उन्हें भी सहायता की आवश्यकता है। उन्होंने राम को विश्वास दिलाया कि सुग्रीव सीता की खोज में उनकी सहायता करेंगे, क्योंकि सुग्रीव के पास अनेक वानर सैनिक हैं जो चारों दिशाओं में जा सकते हैं। हनुमान ने अपना वास्तविक रूप धारण किया, एक विशाल वानर में परिवर्तित होकर, और राम और लक्ष्मण को अपने कंधों पर बिठाकर सुग्रीव के पास ले गए।
सुग्रीव से मैत्री
हनुमान राम और लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले गए और दोनों में मित्रता करवाई। अग्नि को साक्षी मानकर, राम और सुग्रीव ने एक दूसरे को मित्र माना और एक दूसरे की सहायता करने का वचन दिया। सुग्रीव ने राम को अपना दुख बताया, कि कैसे बालि ने उन्हें राज्य से निकाल दिया और उनकी पत्नी को भी छीन लिया। राम ने सुग्रीव को आश्वस्त किया कि वे बालि को मारकर उन्हें उनका राज्य वापस दिलाएंगे। राम ने कहा, "हे सुग्रीव, मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि मैं बालि का वध करके तुम्हें तुम्हारा राज्य वापस दिलाऊंगा और तुम्हारी पत्नी को भी वापस दिलाऊंगा।"
राम की कृपा से सुग्रीव को एक नया जीवन मिला। राम के आश्वासन से सुग्रीव का हृदय उत्साह से भर गया। उन्हें विश्वास हो गया कि अब उन्हें अपना राज्य वापस मिलेगा। राम ने सुग्रीव को बालि को चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित किया, और लक्ष्मण ने बालि को मारकर सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बना दिया। सुग्रीव ने बदले में माता सीता की खोज में हर संभव सहायता करने का वचन दिया।
लंका की ओर प्रस्थान
सुग्रीव ने अपनी वानर सेना को सीता की खोज में चारों दिशाओं में भेजा। हनुमान, अंगद, और जामवंत जैसे पराक्रमी वानर दक्षिण दिशा की ओर बढ़े। उन्हें पता चला कि सीता को लंका में अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा गया है। हनुमान ने लंका जाने का निश्चय किया। समुद्र लांघकर हनुमान लंका पहुंचे और सीता को राम की मुद्रिका दी। उन्होंने सीता को राम का संदेश दिया और उन्हें आश्वस्त किया कि राम शीघ्र ही उन्हें रावण से मुक्त कराएंगे। हनुमान ने लंका में उत्पात मचाया, रावण के पुत्र अक्षय कुमार का वध किया, और लंका को आग लगा दी। लंका दहन के बाद हनुमान राम के पास लौट आए और उन्हें सीता का संदेश दिया और लंका की स्थिति का वर्णन किया। अब, राम और उनकी वानर सेना लंका पर आक्रमण करने और सीता को छुड़ाने के लिए तैयार थी।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हनुमान और राम की भेंट, सुग्रीव से राम की मित्रता, और हनुमान द्वारा लंका दहन की घटनाओं का वर्णन है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्ची मित्रता और भगवान के प्रति भक्ति से बड़ी से बड़ी बाधा को भी पार किया जा सकता है। राम की कृपा से सुग्रीव को अपना राज्य वापस मिला और सीता की खोज में सहायता मिली, यह दिखाता है कि भगवान अपने भक्तों की सहायता अवश्य करते हैं।
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