देवी भागवत पुराण – अध्याय 6: शुम्भ-निशुम्भ की पराजय

शुम्भ-निशुम्भ की पराजय
कौशिकी देवी के प्राकट्य से तीनों लोकों में अद्भुत प्रकाश फैल गया था। देवी के इस रूप को देखकर देवतागण हर्षित थे, परन्तु शुम्भ और निशुम्भ के असुर सैनिक क्रोध और भय से कांप रहे थे। उन्हें ज्ञात था कि यह देवी कोई साधारण शक्ति नहीं, बल्कि उनके विनाश का कारण बनने वाली हैं। अब युद्ध का भीषण नाद गूंजने वाला था, और देवी की कृपा से धर्म की स्थापना होने वाली थी।
चण्ड-मुण्ड का वध
देवी कौशिकी सिंह पर सवार होकर असुर सेना की ओर बढ़ीं। उनका तेज ऐसा था मानो सूर्य एक साथ चमक रहे हों। असुर सैनिक भागे भागे फिर रहे थे, परन्तु देवी के बाणों की वर्षा ने उन्हें स्थिर कर दिया। तभी चण्ड और मुण्ड नामक दो महाबलशाली असुर देवी के सामने आकर गर्जने लगे। उनके हाथ में विशाल गदाएं थीं, और उनके नेत्र क्रोध से लाल थे। रक्त की प्यास उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी।
चण्ड ने कहा, "हे देवी! तुम कौन हो? जो हमारे स्वामी शुम्भ-निशुम्भ के राज्य में इस प्रकार उत्पात मचा रही हो? तुम्हें इसका दंड अवश्य मिलेगा!" मुण्ड ने अपनी गदा उठाई और देवी पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा। देवी मुस्कुराईं, उनकी मुस्कान में मृत्यु का भय छुपा था। उन्होंने क्षण भर में अपनी तलवार निकाली और एक ही झटके में चण्ड और मुण्ड के सिर धड़ से अलग कर दिए।
रक्तबीज का संहार
चण्ड और मुण्ड के वध की सूचना सुनकर शुम्भ और निशुम्भ क्रोध से भर गए। उन्होंने रक्तबीज नामक एक ऐसे असुर को भेजा जिसके रक्त की एक बूंद भी धरती पर गिरने से एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था। रक्तबीज ने देवी कौशिकी पर आक्रमण किया। देवी ने अपने बाणों से उसे घायल करना शुरू किया, परन्तु जैसे ही रक्त धरती पर गिरा, वैसे ही असंख्य रक्तबीज उत्पन्न हो गए। देवी और अधिक चिंतित हो उठी, क्योंकि रक्तबीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी।
देवी दुर्गा ने तब काली का रूप धारण किया। काली ने अपनी विशाल जीभ फैला दी और रक्तबीज के शरीर से बहने वाले रक्त की प्रत्येक बूंद को धरती पर गिरने से पहले ही पी लिया। काली ने रक्तबीज के शरीर को चीर कर रख दिया, और इस प्रकार रक्तबीज का अंत हुआ। तीनों लोकों में आनंद छा गया, क्योंकि एक भयानक संकट टल गया था। दुर्गा माँ की जयकार गूंजने लगी।
शुम्भ-निशुम्भ का अंत
रक्तबीज के संहार के बाद, शुम्भ और निशुम्भ स्वयं युद्ध के मैदान में उतरे। शुम्भ ने देवी कौशिकी से कहा, "हे देवी! तुमने हमारे योद्धाओं को मार कर बड़ा अपराध किया है। अब तुम मुझसे युद्ध करो और अपनी शक्ति दिखाओ।" देवी ने उत्तर दिया, "हे असुर! तुम अधर्मी हो, और तुम्हारा अंत निकट है। मैं धर्म की रक्षा के लिए आई हूँ, और मैं तुम्हें अवश्य हराऊंगी।" भयंकर युद्ध हुआ। देवी ने अपने दिव्यास्त्रों से शुम्भ और निशुम्भ पर प्रहार किया। अंत में, देवी ने अपने त्रिशूल से निशुम्भ का वध कर दिया। शुम्भ क्रोध से पागल हो गया और देवी पर आक्रमण करने के लिए दौड़ा, लेकिन देवी ने अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार शुम्भ और निशुम्भ का अंत हुआ, और तीनों लोकों में शांति स्थापित हुई।
अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार दुर्गा माँ ने चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज और अंत में शुम्भ-निशुम्भ का वध करके धर्म की स्थापना की। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि अहंकार और अधर्म का अंत अवश्य होता है, और धर्म की हमेशा विजय होती है। अब अगले अध्याय में हम देवी की महिमा और इस कथा से मिलने वाली सीख के बारे में जानेंगे।
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