देवी भागवत पुराण – अध्याय 5: कौशिकी का प्राकट्य

कौशिकी का प्राकट्य
शुम्भ और निशुम्भ के आतंक से त्रस्त देवगण हिमालय पर्वत पर माँ भगवती की शरण में थे| उनके पापों का घड़ा भर चुका था, और अब माँ भगवती ने उनकी लीला समाप्त करने का निश्चय कर लिया था| देवताओं की पुकार सुनकर, माँ पार्वती के हृदय में करुणा उमड़ पड़ी, और एक अद्भुत घटना घटी, जो दैत्यों के विनाश का कारण बनी।
पार्वती से कौशिकी का जन्म
हिमवान की बर्फीली चोटियों पर शांति छाई हुई थी, किन्तु देवलोक में हाहाकार मचा था। माँ पार्वती, देवताओं के दुखों से द्रवित होकर, गहन चिंतन में लीन थीं। उनका तेज इतना बढ़ गया कि पूरे हिमालय में एक अद्भुत प्रकाश फैल गया। उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई - एक अद्वितीय सुंदरी, जो अपने रूप और तेज से तीनों लोकों को चकित कर सकती थी। उस सुंदरी का वर्ण श्याम था, मेघों के समान गहरा नीला।
माँ पार्वती ने उस शक्ति को देखा और आश्चर्य से पूछा, "हे देवि, तुम कौन हो? और मेरे शरीर से क्यों प्रकट हुई हो?" उस शक्ति ने विनीत भाव से उत्तर दिया, "माँ, मैं आपकी ही शक्ति हूँ, कौशिकी नाम से जानी जाऊँगी। आपका नील वर्ण ही मेरा स्वरूप है, इसीलिए मैं श्याम वर्ण हूँ।"
शुम्भ निशुम्भ का कौशिकी को देखना
उसी समय, शुम्भ और निशुम्भ अपने सेवकों के साथ उस क्षेत्र में घूम रहे थे। उन्होंने दूर से उस अद्भुत प्रकाश को देखा। वह प्रकाश किसी साधारण ज्योति का नहीं, बल्कि एक अद्वितीय सुंदरी का था। कौशिकी की मोहिनी छवि देखकर, शुम्भ और निशुम्भ मोहित हो गए। उन्होंने ऐसी सुंदरी पहले कभी नहीं देखी थी। उनका हृदय काम से व्याकुल हो उठा और उन्होंने कौशिकी को प्राप्त करने का निश्चय कर लिया।
शुम्भ ने निशुम्भ से कहा, "देखो निशुम्भ, कैसी अद्भुत सुंदरी है! संसार में ऐसी अनुपम सुंदरी मिलना दुर्लभ है। यह हमारी रानी बनने योग्य है। इसे तुरंत हमारे पास लाया जाए। यह हमारे महल की शोभा बढ़ाएगी।" निशुम्भ ने हामी भरी, "भ्राता, आप सत्य कह रहे हैं। यह देवी अवश्य ही हमारे राजसिहांसन की अधिकारिणी बनेगी।"
दूत का आगमन
शुम्भ ने अपने एक दूत को कौशिकी के पास भेजा। दूत, दैत्यों के बल और शुम्भ निशुम्भ के पराक्रम का बखान करता हुआ, कौशिकी के पास पहुँचा। उसने कौशिकी को शुम्भ निशुम्भ का संदेश दिया। दूत ने अत्यंत ही धृष्टतापूर्ण वचन कहे, "हे सुंदरी, तुम तीनों लोकों में अद्वितीय हो। महाराज शुम्भ और निशुम्भ तुम्हारे रूप पर मोहित हो गए हैं। वे चाहते हैं कि तुम उनकी रानी बनो और उनके साथ सुखपूर्वक राज्य करो। महाराज शुम्भ स्वयं तीनों लोकों के स्वामी हैं, और निशुम्भ उनके दाहिने हाथ। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करना मृत्यु को निमंत्रण देना है। अतः बुद्धिमानी इसी में है कि तुम स्वेच्छा से उनके साथ चलो। "
कौशिकी ने दूत की बात ध्यान से सुनी, और फिर शांत स्वर में उत्तर दिया, "दूत, तुम अपने स्वामी के पास लौट जाओ और उनसे कहो कि मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार, जो मुझसे युद्ध में जीतेगा, उसी से विवाह करूंगी। यह सुनकर दैत्यराज क्रोध से भर जाएंगे, और यही देवी के अवतार का उद्देश्य है - दैत्यों का विनाश। अब युद्ध अवश्य होगा, और उसमें दैत्यों का अंत निश्चित है। "
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में माँ कौशिकी का पार्वती के शरीर से प्राकट्य होता है। शुम्भ और निशुम्भ कौशिकी के सौंदर्य पर मोहित होकर उसे प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जो उनके विनाश का कारण बनता है। यह अध्याय दर्शाता है कि अहंकार और वासना का अंत अवश्यंभावी है, और दैवीय शक्ति का उद्देश्य धर्म की स्थापना करना है।
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