रामचरितमानस – अध्याय 7: उत्तरकाण्ड: राज्याभिषेक व शासन | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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रामचरितमानस – अध्याय 7: उत्तरकाण्ड: राज्याभिषेक व शासन

Tilak Kathayein13 Apr 202677 views📖 1 min read
रामचरितमानस
रामचरितमानस का अध्याय 7 — उत्तरकाण्ड: राज्याभिषेक व शासन। यह काण्ड राम के अयोध्या लौटने, राज्याभिषेक और आदर्श शासन का वर्णन करता है।

उत्तरकाण्ड: राज्याभिषेक व शासन

लंका दहन के बाद, रावण का अंत हुआ और अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित हुई। अब, माता सीता की अग्निपरीक्षा के बाद, प्रभु राम, लक्ष्मण और हनुमान सहित पूरी वानर सेना अयोध्या की ओर प्रस्थान कर रही है, जहाँ अयोध्यावासी अपने प्रिय राजकुमार के चौदह वर्ष के वनवास की समाप्ति का उत्सुकता से इंतज़ार कर रहे हैं। शोक और निराशा से भरी अयोध्या नगरी, राम के आगमन की कल्पना मात्र से ही पुलकित हो रही है।

अयोध्या में आगमन

पुष्पक विमान आकाश में एक सुनहरा निशान छोड़ता हुआ अयोध्या की ओर बढ़ रहा था। नीचे, सरयू नदी शांत और निर्मल बह रही थी, मानों राम के स्वागत के लिए आतुर हो। अयोध्या सज-धज कर दुल्हन की तरह तैयार थी। द्वार-द्वार पर तोरण बंधे थे, गलियों में रंगोली सजी थी, और हर घर में उत्सव का माहौल था। भरत, अपने भाई के चरणों में समर्पित, नंगे पैर, तपस्वी जीवन जी रहे थे। उनका हृदय राम के दर्शन के लिए तड़प रहा था। माता कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा भी पुत्र के आगमन की प्रतीक्षा में व्याकुल थीं, उनकी आँखें दरवाज़े पर टिकी हुई थीं।

हनुमान ने आगे बढ़कर प्रभु राम के आगमन का संदेश भरत को दिया। भरत की आँखों में आंसू थे, वे दौड़ पड़े अपने भाई का स्वागत करने। "प्रभु राम आ रहे हैं! चौदह वर्ष की प्रतीक्षा समाप्त हुई!" भरत ने हर्ष से कहा। "आज मेरा जीवन धन्य हो गया, अब मैं प्रभु के चरणों में अपनी सेवा अर्पित कर सकूंगा।" माता कौशल्या ने अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा, "मेरे राम लौट रहे हैं, मेरे राम लौट रहे हैं।"

राज्याभिषेक

राम का पुष्पक विमान अयोध्या में उतरा। भरत ने दौड़कर प्रभु राम के चरण छुए। राम ने भरत को गले लगाया, मानो चौदह वर्षों का वियोग एक पल में ही मिट गया। अयोध्यावासी 'जय श्री राम' के नारों से गूंज उठे। सीता मैया ने माता कौशल्या और अन्य माताओं के चरण स्पर्श किए। इसके बाद, शुभ मुहूर्त में राम का राज्याभिषेक हुआ। वशिष्ठ मुनि ने मंत्रोच्चार किया और राम को अयोध्या के राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। सीता, राम के साथ सिंहासन पर विराजमान हुईं, मानो शक्ति और मर्यादा का संगम हो रहा हो।

राम के राज्याभिषेक के साथ ही अयोध्या में सुख और समृद्धि का युग आरम्भ हुआ। प्रभु राम की कृपा से सभी दुखी और पीड़ित लोग सुखी हो गए। चारों ओर धर्म और न्याय का बोलबाला था। राम ने प्रजा को अपना परिवार माना और उनकी सेवा में जीवन समर्पित कर दिया। राम नाम का स्मरण ही सभी कष्टों को दूर करने वाला बन गया।

रामराज्य की स्थापना

रामराज्य में कोई दुखी नहीं था, कोई गरीब नहीं था। सभी लोग धर्म के मार्ग पर चलते थे और एक-दूसरे की सहायता करते थे। चोरी, बेईमानी और झूठ का कोई स्थान नहीं था। नदियाँ निर्मल थीं, खेत हरे-भरे थे, और प्रकृति अपने पूर्ण वैभव में विराजमान थी। यह रामराज्य, एक आदर्श राज्य था, जहाँ धर्म, न्याय और प्रेम का शासन था। राम ने चौदह वर्ष तक अयोध्या पर शासन किया, और उनके शासनकाल को स्वर्ण युग के रूप में याद किया जाता है। भगवान राम ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म के मार्ग पर चलकर ही एक आदर्श समाज की स्थापना की जा सकती है।

अध्याय 7 का सार: उत्तरकाण्ड में राम का अयोध्या लौटना, राज्याभिषेक, और रामराज्य की स्थापना का वर्णन है। यह अध्याय धर्म और न्याय के शासन का महत्व बताता है, और हमें यह सिखाता है कि एक आदर्श समाज कैसे बनाया जा सकता है। इस अध्याय से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें अपने जीवन में धर्म का पालन करना चाहिए और दूसरों की सेवा करनी चाहिए।

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