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रामचरितमानस – अध्याय 4: किष्किन्धाकाण्ड: वानर गठबंधन

Tilak Kathayein13 Apr 2026171 views📖 1 min read
रामचरितमानस
रामचरितमानस का अध्याय 4 — किष्किन्धाकाण्ड: वानर गठबंधन। यह काण्ड राम और हनुमान की भेंट, सुग्रीव की मित्रता और बाली के वध की कथा कहता है।

किष्किन्धाकाण्ड: वानर गठबंधन

अरण्यकाण्ड में शबरी के आश्रम में प्रभु राम ने अपने वनवास जीवन को और भी गहन बनाया। शबरी के भक्ति भाव से अभिभूत होकर और उसके जूठे बेर खाकर, राम ने दर्शाया कि प्रेम और समर्पण से बढ़कर कुछ भी नहीं। अब, राम सीता की खोज में आगे बढ़ते हैं, उनकी यात्रा उन्हें ऋष्यमूक पर्वत की ओर ले जाती है, जहाँ वे वानरों से मिलेंगे और एक नया बंधन बनेगा।

पम्पा सरोवर पर हनुमान से भेंट

पम्पा सरोवर के शांत जल में राम और लक्ष्मण स्नान कर रहे थे, प्रकृति की शांत सुंदरता के बीच भी सीता के वियोग का दुःख उनके चेहरे पर स्पष्ट था। लक्ष्मण, अपने बड़े भाई को इस पीड़ा में देख व्याकुल थे। तभी उन्हें ऋष्यमूक पर्वत की ओर से एक वानर आता हुआ दिखाई दिया, जो देखने में अद्भुत था – बलशाली, तेजस्वी और वाणी में मिठास लिए। वह हनुमान थे, जो सुग्रीव के सेवक और परम भक्त थे। हनुमान को सुग्रीव ने राम और लक्ष्मण की जानकारी लेने के लिए भेजा था, क्योंकि सुग्रीव को बाली से डर था और उन्हें लगा कि ये दोनों राजकुमार बाली के भेजे हुए गुप्तचर हो सकते हैं।

हनुमान प्रभु राम के सामने नतमस्तक हो गए। उन्होंने बड़ी विनम्रता से पूछा, "हे तेजस्वी राजकुमार, आप कौन हैं और इस वन में किस कारण से आए हैं? आपका रूप देखकर लगता है कि आप कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि देवता हैं। यदि आप बताने की कृपा करें तो मेरा संशय दूर हो।" राम ने हनुमान के शब्दों में छिपे हुए प्रेम और भक्ति को महसूस किया। उन्होंने लक्ष्मण को हनुमान के प्रश्नों का उत्तर देने का संकेत किया। लक्ष्मण ने राम के कहने पर अपनी और राम की कथा हनुमान को विस्तार से बताई।

सुग्रीव से मित्रता

हनुमान, राम और लक्ष्मण की कथा सुनकर भाव-विभोर हो गए। उन्होंने जान लिया कि यही वे राम हैं जिनकी सुग्रीव प्रतीक्षा कर रहे थे। हनुमान ने तत्काल राम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बिठाया और उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर ले गए, जहाँ सुग्रीव अपने साथियों के साथ छिपे हुए थे। सुग्रीव, हनुमान के साथ राम और लक्ष्मण को देखकर प्रसन्न हुए। उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी मुसीबतें अब दूर होने वाली हैं। सुग्रीव ने राम को बाली के द्वारा किए गए अपने अन्याय के बारे में बताया - किस प्रकार बाली ने उसे राज्य से निकाल दिया और उसकी पत्नी को छीन लिया।

राम ने सुग्रीव की बात सुनकर उसे आश्वासन दिया, "सुग्रीव, तुम चिंता मत करो। जिसने तुम्हारे साथ अन्याय किया है, उसे दंड अवश्य मिलेगा। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि मैं बाली का वध करूँगा और तुम्हारा राज्य तुम्हें वापस दिलाऊँगा। तुम मेरे मित्र हो और मित्र का दुख दूर करना मेरा धर्म है।" राम की वाणी में शक्ति थी, उनके शब्दों में करुणा थी और उनकी आँखों में न्याय का संकल्प था। सुग्रीव को राम पर पूर्ण विश्वास हो गया। इस प्रकार, अग्नि को साक्षी मानकर राम और सुग्रीव के बीच मित्रता का अटूट बंधन स्थापित हुआ।

बाली का वध

राम ने सुग्रीव को बाली से युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित किया। सुग्रीव, राम के आश्वासन से उत्साहित होकर बाली को ललकारने के लिए किष्किन्धा नगरी की ओर चल पड़ा। बाली, सुग्रीव की ललकार सुनकर क्रोधित हो गया और तुरंत युद्ध के लिए बाहर निकला। दोनों भाइयों में भयंकर युद्ध हुआ। राम एक पेड़ के पीछे छिपकर युद्ध देख रहे थे, क्योंकि उन्हें बाली को मारने का उचित अवसर नहीं मिल रहा था। बाली और सुग्रीव दोनों ही एक समान शक्तिशाली थे और राम को दोनों में अंतर कर पाना मुश्किल हो रहा था। तब राम ने सुग्रीव को हारते देख बाली पर तीर चला दिया। तीर सीधे बाली के हृदय में लगा और वह धरती पर गिर पड़ा।

बाली ने मूर्छित अवस्था में राम को देखा और क्रोधित होकर कहा, "हे राम, तुमने धर्म का उल्लंघन किया है। तुमने छिपकर मुझ पर वार किया, जो कि न्यायोचित नहीं है। क्या यही तुम्हारा धर्म है?" राम ने बाली को उत्तर दिया, "बाली, तुमने अपने छोटे भाई की पत्नी को छीनकर और उसे राज्य से निकालकर अन्याय किया है। तुमने धर्म का उल्लंघन किया, इसलिए तुम्हें दंड मिलना ही चाहिए था। मैंने तो केवल धर्म का पालन किया है।" राम की कृपा से बाली को अपने पापों का पश्चाताप हुआ और उसने मरते समय राम से क्षमा मांगी। राम ने बाली को मोक्ष प्रदान किया और सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बना दिया।

सीता की खोज का संकल्प

बाली के वध के बाद सुग्रीव ने राम को वचन दिया कि वह सीता की खोज में वानर सेना को भेजेगा। सुग्रीव ने अपनी वानर सेना को चारों दिशाओं में भेजकर सीता की खोज शुरू कर दी। राम, सुग्रीव की सहायता से अब सीता तक पहुंचने का रास्ता ढूंढने के लिए तैयार थे। वानर सेना का सहयोग मिलने से राम की यात्रा और भी सशक्त होती है। अब अगला अध्याय हनुमान की लंका की ओर यात्रा पर केंद्रित होगा, जो रामभक्ति का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करेगा।

अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में राम और हनुमान का मिलन होता है, सुग्रीव से मित्रता होती है और बाली का वध होता है। इसका आध्यात्मिक सार यह है कि भगवान अपने भक्तों की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं और धर्म की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। अन्याय का अंत अवश्य होता है और सत्य की विजय हमेशा अटल रहती है।

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आज का पंचांग 29 अगस्त 2026

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