देवी भागवत पुराण – अध्याय 3: महिषासुर का अंत

महिषासुर का अंत
पिछले अध्याय में हमने देखा कि कैसे देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध चला। असुरों की सेना का देवी ने संहार किया, लेकिन महिषासुर अभी भी हार मानने को तैयार नहीं था। वह निरंतर रूप बदल-बदल कर देवी पर आक्रमण कर रहा था, जिससे युद्ध और भी भीषण हो गया था। अब आगे की कथा में जानते हैं कि महिषासुर का अंत कैसे हुआ।
अंतिम प्रहार
युद्ध के दसवें दिन, महिषासुर ने क्रोध में आकर भैंसे का विकराल रूप धारण कर लिया। उसके सींगों से पर्वतों को उखाड़ फेंका और अपनी पूंछ से समुद्र में भयंकर लहरें उत्पन्न कर दीं। उसकी गर्जना से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवताओं के हृदय भय से कांप उठे। चारों ओर अंधकार छा गया, मानो प्रलय आ गया हो। महिषासुर अपने प्रचंड वेग से देवी दुर्गा की ओर दौड़ा। उसके नेत्र लाल थे और उनमें विनाश की ज्वाला धधक रही थी।
"आज मैं इस स्त्री का अंत करके ही रहूंगा!" महिषासुर ने क्रोधित होकर सोचा। "देवताओं और ऋषियों को अब कोई नहीं बचा सकता। यह दुर्गा मेरे बल का अनुमान नहीं लगा पाई। आज मैं इसे दिखा दूंगा कि असुरों के राजा से बैर लेना कितना महंगा पड़ता है।"
देवी दुर्गा द्वारा वध
देवी दुर्गा शांत और स्थिर थीं। उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को धारण किया और सिंह पर सवार होकर महिषासुर की ओर देखा। उनकी आंखों में करुणा और क्रोध का मिश्रण था। जैसे ही महिषासुर ने आक्रमण किया, देवी ने अपने त्रिशूल से उसके सीने पर प्रहार किया। त्रिशूल वज्र की भांति महिषासुर के हृदय को चीरता हुआ निकल गया। महिषासुर दहाड़ मारते हुए धरती पर गिर पड़ा। उसके शरीर से रक्त की धारा बह निकली।
देवी दुर्गा की कृपा से महिषासुर का वध हुआ। यह केवल एक असुर का अंत नहीं था, बल्कि अहंकार, अन्याय और अत्याचार का अंत था। देवी ने अपने भक्तों को यह संदेश दिया कि धर्म की हमेशा विजय होती है और अधर्म का नाश निश्चित है। उन्होंने देवताओं और मनुष्यों को भय से मुक्त किया और उन्हें शांति और समृद्धि प्रदान की।
देवताओं द्वारा स्तुति
महिषासुर का वध होते ही देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। उन्होंने देवी दुर्गा की स्तुति गान करना आरम्भ कर दिया। चारों दिशाएं जय-जयकार से गूंज उठीं। स्वर्ग में आनंद छा गया। देवराज इंद्र, अग्नि, वरुण, कुबेर आदि सभी देवी के चरणों में नतमस्तक हुए। उन्होंने देवी की शक्ति, साहस और करुणा की प्रशंसा की।
"हे देवी!" इंद्र ने कहा। "आपने हम देवताओं को महिषासुर के आतंक से बचाया है। आपके इस उपकार को हम कभी नहीं भूलेंगे। आपकी जय हो! जय हो! जय हो!" सभी देवता एक स्वर में देवी की जयकार कर रहे थे। देवी दुर्गा ने प्रसन्न होकर देवताओं को आशीर्वाद दिया और उन्हें अभयदान दिया। परन्तु अभी असुरों का आतंक समाप्त नहीं हुआ था। शुम्भ और निशुम्भ नामक दो और शक्तिशाली असुर बचे हुए थे, जो देवताओं के लिए एक नई चुनौती बनने वाले थे। अगले अध्याय में हम जानेंगे कि देवी दुर्गा ने शुम्भ और निशुम्भ का संहार कैसे किया।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने महिषासुर के अंतिम प्रयास और देवी दुर्गा द्वारा उसके वध का वर्णन देखा। यह अध्याय हमें सिखाता है कि अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है और धर्म की हमेशा विजय होती है। देवी दुर्गा ने अपने भक्तों को साहस और शक्ति प्रदान की और उन्हें बुराई से लड़ने के लिए प्रेरित किया।
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