श्रीमद भागवत पुराण – अध्याय 7: कृष्ण अवतार: प्रेम और धर्म

कृष्ण अवतार: प्रेम और धर्म
राम अवतार में धर्म की विजय के पश्चात, पृथ्वी पर बढ़ता हुआ अधर्म और अत्याचार देवताओं को चिंतित करने लगा था। कंस के आतंक से मथुरा त्रस्त थी और धरती माँ कराह रही थी। ऐसे में, भगवान विष्णु ने अपने पूर्ण अवतार के रूप में कृष्ण रूप में जन्म लेने का संकल्प लिया, ताकि प्रेम और धर्म की स्थापना हो सके।
मथुरा में जन्म: आनंद और भय
भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी रात थी। कारागार में वसुदेव और देवकी बंदी थे। कंस के भय से त्रस्त, वे हर क्षण मृत्यु की आशंका से घिरे हुए थे। अचानक, कारागार में दिव्य प्रकाश फैला। वसुदेव और देवकी ने देखा कि उनके समक्ष भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए हैं। उनके मुख पर शांति और प्रेम की अद्भुत आभा थी, जिसने भय को कुछ पल के लिए दूर कर दिया। माता देवकी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रभु को प्रणाम किया।
विष्णु भगवान ने कहा, "हे देवकी, हे वसुदेव, डरो मत। मैं जानता हूँ कि कंस ने तुम दोनों पर कितने अत्याचार किए हैं। अब मेरा अवतार कंस के वध और धर्म की स्थापना के लिए होगा। मुझे बाल रूप में धारण करो और मुझे गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के पास ले जाओ। वहाँ, मैं सुरक्षित रहूँगा।" वसुदेव और देवकी ने प्रभु की आज्ञा का पालन करने का निश्चय किया, उनके हृदय श्रद्धा और आनंद से भर उठे।
बाल लीला: माखन चोर से विश्वरूप दर्शन
गोकुल में कृष्ण का बचपन अद्भुत था। अपनी बाल लीलाओं से उन्होंने सबका मन मोह लिया। वे माखन चुराते, गोपियों को सताते और अपनी बांसुरी की मधुर ध्वनि से सबको मोहित कर देते थे। यशोदा मैया उन्हें लाड़-प्यार से पालती थीं, उनकी हर शरारत पर हंसती और उन्हें डांटती भी थीं। एक बार, यशोदा मैया ने कृष्ण के मुख में मिट्टी देखकर उन्हें डांटा और मुख खोलने को कहा। जब कृष्ण ने मुख खोला, तो यशोदा मैया आश्चर्यचकित रह गयीं। उन्होंने कृष्ण के मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, तारे, ग्रह और सभी लोक देखे। उन्हें क्षण भर के लिए कृष्ण के दिव्य स्वरूप का दर्शन हुआ, और वे समझ गयीं कि कृष्ण साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं।
गोकुल में कृष्ण ने कई असुरों का वध किया, अपनी लीलाओं से कंस के भेजे हुए राक्षसों को परास्त किया। कृष्ण का प्रेम और उनकी शक्ति दोनों ही अद्भुत थे। यह विष्णु की कृपा ही थी जिसने गोकुल को असुरों से बचाया और कृष्ण को अपनी लीलाएँ करने का अवसर दिया।
कुरुक्षेत्र में गीता: धर्म का उपदेश
समय बीता और कृष्ण युवान हुए। महाभारत के युद्ध के कुरुक्षेत्र में उन्होंने अर्जुन को भगवत गीता का उपदेश दिया। अर्जुन मोह और शोक में डूबे हुए थे, अपने ही कुटुम्ब के विरुद्ध युद्ध करने को तैयार नहीं थे। तब कृष्ण ने उन्हें धर्म, कर्म और ज्ञान का मार्ग दिखाया। उन्होंने अर्जुन को आत्मा की अमरता, कर्मफल के सिद्धांत और निष्काम कर्म के महत्व का उपदेश दिया। उन्होंने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया, जिससे अर्जुन को भगवान के सर्वव्यापी स्वरूप का ज्ञान हुआ।
"अर्जुन," कृष्ण ने कहा, "कर्म करो, फल की चिंता मत करो। जो कुछ भी होता है, वह मेरे नियंत्रण में है। तुम केवल निमित्त मात्र हो।" कृष्ण के उपदेश ने अर्जुन को प्रेरित किया और उन्होंने धर्म के लिए युद्ध किया। यह विष्णु की कृपा थी कि गीता का ज्ञान कुरुक्षेत्र में अर्जुन को मिला और आज भी यह ज्ञान पूरी मानवता को मार्ग दिखाता है।
अध्याय का समापन: विष्णु की महिमा
कृष्ण अवतार प्रेम, धर्म और ज्ञान का प्रतीक है। कृष्ण ने अपने जीवनकाल में अन्याय और अधर्म का नाश किया और प्रेम और करुणा का संदेश फैलाया। भगवत गीता का उपदेश आज भी मानव जाति को जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। अगले अध्याय में हम विष्णु के अन्य अवतारों और उनकी महिमा के बारे में जानेंगे, यह देखते हुए कि कैसे भगवान अलग-अलग रूपों में धरती पर आकर धर्म की रक्षा करते हैं।
अध्याय 7 का सार: कृष्ण अवतार में भगवान विष्णु ने कंस का वध किया, बाल लीलाओं से सबका मन मोह लिया, और अर्जुन को भगवत गीता का उपदेश देकर धर्म का मार्ग दिखाया। इस अवतार का मुख्य उद्देश्य प्रेम और धर्म की स्थापना करना था, जिसके द्वारा मानव जाति आज भी प्रेरित है।
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