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श्रीमद भागवत पुराण – अध्याय 3: हिरण्यकशिपु और नरसिंह अवतार

Tilak Kathayein13 Apr 2026161 views📖 1 min read
श्रीमद भागवत पुराण
श्रीमद भागवत पुराण का अध्याय 3 — हिरण्यकशिपु और नरसिंह अवतार। हिरण्यकशिपु की तपस्या और अत्याचार, और भगवान विष्णु द्वारा नरसिंह अवतार लेकर उसका वध।

हिरण्यकशिपु और नरसिंह अवतार

वराह अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी का उद्धार किया, दैत्य हिरण्याक्ष का वध हुआ। हिरण्याक्ष की मृत्यु से उसका भाई हिरण्यकशिपु शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठा। उसने देवताओं से बदला लेने और अमरत्व प्राप्त करने का प्रण लिया, जिससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।

हिरण्यकशिपु की कठोर तपस्या

हिरण्यकशिपु मंदराचल पर्वत पर गया और उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या आरम्भ की। वह वर्षों तक केवल वायु पीकर खड़ा रहा। उसकी तपस्या इतनी भयंकर थी कि उसके शरीर से अग्नि निकलने लगी, जिसने तीनों लोकों को तप्त कर दिया। देवतागण भयभीत होकर ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे हिरण्यकशिपु की तपस्या भंग करें।

इंद्र आदि देवताओं को भयभीत देखकर ब्रह्मा जी ने कहा, “हे देवगण! मैं हिरण्यकशिपु के तप को भंग करने का वचन देता हूं। उसकी तपस्या से समस्त संसार जल रहा है, इसलिए हमें तुरंत उस तपस्वी के पास जाना चाहिए।” ब्रह्मा जी हंस पर सवार होकर हिरण्यकशिपु के पास पहुंचे और गंभीर वाणी में बोले, “हे हिरण्यकशिपु! तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ। वर मांगो।” हिरण्यकशिपु ने आँखें खोलीं और ब्रह्मा जी को प्रणाम करके अमरत्व का वर मांगा।

प्रह्लाद की भक्ति और हिरण्यकशिपु का अत्याचार

ब्रह्मा जी ने कहा, "हे हिरण्यकशिपु! जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। अमरत्व का वर मैं नहीं दे सकता। कोई और वरदान मांगो।" हिरण्यकशिपु ने बहुत सोच-विचारकर एक ऐसा वर मांगा जिससे वह अजेय बन जाए। उसने कहा, "मुझे न मनुष्य मारे, न पशु मारे, न दिन में मृत्यु हो, न रात में, न घर के भीतर मरूं, न बाहर, न पृथ्वी पर मरूं न आकाश में, न किसी अस्त्र से मरूं और न किसी शस्त्र से।" ब्रह्मा जी ने "तथास्तु" कहा और चले गए। वरदान पाकर हिरण्यकशिपु अहंकारी हो गया और उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया। उसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और देवताओं को बंदी बना लिया।

हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह गर्भ से ही विष्णु भक्ति में लीन रहता था। हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को विष्णु भक्ति से विमुख करने के अनेक प्रयास किए, परन्तु प्रह्लाद अपने भक्ति मार्ग से विचलित नहीं हुआ। उसने अपने पुत्र को पर्वत से गिरा दिया, विष पिलाया, और अग्नि में जलाया, परन्तु हर बार भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की। प्रह्लाद का कहना था, "पिताजी, भगवान विष्णु ही सत्य हैं, वे ही पालनहार हैं, वे ही मुक्तिदाता हैं। हमें उन्हीं की उपासना करनी चाहिए।" हिरण्यकशिपु क्रोध से पागल हो गया और उसने प्रह्लाद को मारने का निश्चय किया। भगवान विष्णु अपने भक्त की पुकार सुनकर द्रवित हो गए।

नरसिंह अवतार द्वारा हिरण्यकशिपु का वध

हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से कहा, "यदि तुम्हारा भगवान सर्वव्यापी है, तो क्या वह इस खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने निर्भय होकर कहा, "हां पिताजी, वे इस खंभे में भी हैं।" क्रोधित हिरण्यकशिपु ने खंभे पर प्रहार किया, तभी उस खंभे से अत्यंत भयंकर गर्जना हुई और भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए। नरसिंह भगवान का आधा शरीर सिंह का और आधा मनुष्य का था। उन्होंने हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जांघ पर लिटाया और अपने नाखूनों से उसका पेट फाड़ डाला। यह संध्या का समय था, न दिन था न रात। वे उसे घर की देहरी पर ले गए, जो न घर के भीतर थी न बाहर, न धरती पर था न आकाश में। इस प्रकार भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी के वरदान का मान रखते हुए हिरण्यकशिपु का वध किया।

नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद को अपने चरणों में बिठाकर आशीर्वाद दिया। उन्होंने देवताओं को मुक्त कराया और धर्म की स्थापना की। समस्त लोकों में शांति स्थापित हुई। भगवान विष्णु की जय-जयकार होने लगी। भक्त प्रह्लाद की भक्ति देखकर सभी आश्चर्यचकित थे। उनके हृदय में भगवान के प्रति और भी अधिक श्रद्धा उत्पन्न हुई।

वामन अवतार की ओर

हिरण्यकशिपु का वध हो जाने के बाद, दैत्यों का भय कुछ कम हुआ। परन्तु दैत्यों का प्रभाव अभी भी बना हुआ था। अगले अवतार में, भगवान विष्णु वामन रूप में प्रकट होंगे और राजा बलि की परीक्षा लेंगे, जिससे देवताओं और मनुष्यों को और भी अधिक शांति और सुरक्षा मिलेगी। इस अध्याय के अंत के साथ ही हमने अगले अध्याय की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है, जहां धर्म और न्याय की पुनर्स्थापना की कहानी जारी रहेगी।

अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने हिरण्यकशिपु की कठोर तपस्या, प्रह्लाद की अटूट भक्ति, और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करने की कथा सुनी। इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति और विश्वास से भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, और अहंकार का अंत अवश्य होता है।

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