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श्रीमद भागवत पुराण – अध्याय 4: वामन अवतार: राजा बलि की परीक्षा

Tilak Kathayein13 Apr 2026100 views📖 1 min read
श्रीमद भागवत पुराण
श्रीमद भागवत पुराण का अध्याय 4 — वामन अवतार: राजा बलि की परीक्षा। राजा बलि के अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान विष्णु वामन अवतार लेते हैं और उनसे तीन पग भूमि दान में मांगते हैं।

वामन अवतार: राजा बलि की परीक्षा

हिरण्यकशिपु के अंत के पश्चात, देवताओं और मनुष्यों में शांति छा गई। भगवान नरसिंह के रौद्र रूप के शांत होने पर, प्रजा ने चैन की सांस ली। परन्तु दैत्यों के वंश में एक और शक्तिशाली राजा का उदय होने वाला था, राजा बलि, जो अपनी दानवीरता और सत्यनिष्ठा के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध होने वाले थे।

राजा बलि का यज्ञ अनुष्ठान

राजा बलि, प्रह्लाद के पौत्र थे, और उनमें अपने दादा की भक्ति के गुण विद्यमान थे। उन्होंने दैत्यों को संगठित किया और अपनी शक्ति के बल पर स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया। इंद्र और अन्य देवता स्वर्ग से निष्कासित होकर भगवान विष्णु की शरण में गए। राजा बलि ने नर्मदा नदी के तट पर एक विशाल अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। चारों ओर समृद्धि थी, ब्राह्मणों को दान दिया जा रहा था, और प्रजा सुख और शांति से जीवन यापन कर रही थी। यज्ञ की अग्नि में घी और अन्य सुगंधित वस्तुएं अर्पित की जा रही थीं, जिनसे वातावरण दिव्य हो गया था। बलि का यश तीनों लोकों में फैल रहा था, और देवता अपनी शक्तिहीनता से व्याकुल थे।

राजा बलि यज्ञ में बैठे अपने गुरु शुक्राचार्य से बोले, "गुरुदेव, मेरा एकमात्र लक्ष्य है कि प्रजा सुखी रहे और धर्म की स्थापना हो। मैं किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाऊंगा। यह मेरा व्रत है।" शुक्राचार्य ने कहा, "राजन, तुम्हारा यह संकल्प प्रशंसनीय है, परन्तु सावधान रहो। देवता छल करने में माहिर होते हैं।"

विष्णु का वामन रूप में आगमन

देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन रूप में जन्म लिया। वे तेजस्वी बालक थे, जिनके शरीर पर यज्ञोपवीत सुशोभित था। वे बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे, जहां राजा बलि ब्राह्मणों को दान दे रहे थे। वामन को देखकर बलि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें सादर आसन दिया। वामन ने बलि से कहा, "राजन, मैं एक ब्राह्मण बालक हूं और मुझे अपने जीवन यापन के लिए कुछ भूमि की आवश्यकता है। मुझे केवल तीन पग भूमि दान में चाहिए।"

राजा बलि ने हँसते हुए कहा, "हे ब्राह्मण बालक, तुम इतने छोटे हो, तीन पग भूमि से तुम्हारा क्या होगा? तुम जो चाहो मांग लो।" तब वामन ने कहा, "राजन, मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए। अधिक की लालसा नहीं करनी चाहिए।" उसी समय, शुक्राचार्य ने राजा बलि को चेताया, "राजन, सावधान! यह वामन रूप में स्वयं विष्णु हैं। इन्हें दान मत दो।"

तीन पग भूमि दान और बलि का पाताल लोक गमन

बलि ने शुक्राचार्य की बात अनसुनी कर दी। उन्होंने वामन से कहा, "हे ब्राह्मण बालक, मैं तुम्हें तीन पग भूमि दान करने का वचन देता हूं।" वामन ने अपना रूप विशाल कर लिया। एक पग में उन्होंने पूरी पृथ्वी नाप ली, दूसरे पग में स्वर्ग। अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा था। बलि ने विनम्रता से कहा, "भगवन, मेरे पास अब कुछ नहीं बचा। अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिये।" भगवान विष्णु बलि की सत्यनिष्ठा और दानवीरता से प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को पाताल लोक का राजा बना दिया और उसे वरदान दिया कि वह सदैव देवताओं द्वारा सम्मानित किया जाएगा। बलि ने भक्तिभाव से विष्णु को प्रणाम किया और पाताल लोक चले गए। इस प्रकार, देवताओं को स्वर्ग पुनः प्राप्त हुआ।

भगवान विष्णु ने बलि को पाताल लोक का राजा बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति और सत्यनिष्ठा किसी भी परिस्थिति में महत्वपूर्ण हैं। चाहे राजा हो या रंक, जो भगवान के प्रति समर्पित है, उसे अवश्य ही फल मिलता है। उनकी कृपा से बलि को अपमानित होने के बजाय सम्मान प्राप्त हुआ, भले ही वो पाताल लोक में चले गए।

अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने वामन अवतार और राजा बलि की परीक्षा के बारे में पढ़ा। भगवान विष्णु ने वामन रूप में आकर बलि की दानवीरता की परीक्षा ली और उन्हें पाताल लोक का राजा बनाकर सम्मानित किया। यह कथा हमें सत्यनिष्ठा, दान और भगवान के प्रति समर्पण का महत्व सिखाती है। अब हम अगले अध्याय में मत्स्य और कूर्म अवतार की कथा सुनेंगे.

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