श्रीमद भागवत पुराण – अध्याय 1: सृष्टि का आरंभ और विष्णु

सृष्टि का आरंभ और विष्णु
शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी से प्रश्न किया, "हे सूत जी, हमें उस परम सत्य के बारे में बताइए जिससे यह सृष्टि उत्पन्न हुई, जिसमें यह टिकी हुई है और जिसमें अंततः विलीन हो जाएगी।" सूत जी ने उत्तर दिया, "हे ऋषियों, मैं आप सबको उस आदि पुरुष, भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करूंगा, जिन्होंने अपनी माया से इस जगत का निर्माण किया।"
ब्रह्मा जी की उत्पत्ति
प्रलय के उपरांत, जब सर्वत्र अंधकार और जल ही जल था, तब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा में क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर विराजमान थे। उनकी नाभि से एक कमल का पुष्प प्रकट हुआ, जो अत्यंत तेजस्वी था और अपनी दिव्य आभा से सारे अंधकार को दूर कर रहा था। उस कमल के भीतर, ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। वे चकित थे, उन्हें पता नहीं था कि वे कहाँ हैं और उनका अस्तित्व क्या है। चारों दिशाओं में देखने पर, उन्हें केवल जल ही जल दिखाई दिया, और वह कमल का अद्भुत पुष्प। उनके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई "यह क्या है? मैं कौन हूँ? और मेरा उद्देश्य क्या है?"
ब्रह्मा जी ने विचार किया, "मुझे इस कमल के मूल को खोजना चाहिए, शायद वहीं मेरे प्रश्नों का उत्तर छिपा हो।" उन्होंने पुष्प के डंठल के सहारे नीचे उतरना प्रारंभ किया, पर वह अंतहीन प्रतीत हो रहा था। थक हार कर वे हार गए और वापस कमल पर आ गए। निराश होकर, ब्रह्मा जी ध्यान में बैठ गए, भगवान विष्णु का स्मरण करने लगे।
विष्णु का क्षीरसागर में शयन
ब्रह्मा जी के ध्यान से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए। वे क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर लेटे हुए थे, उनका मुखमंडल शांत और तेजस्वी था। ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी उत्पत्ति और उद्देश्य के बारे में पूछा।
भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे ब्रह्मा, तुम मेरे ही अंश हो। तुम्हारी उत्पत्ति इस सृष्टि का निर्माण करने के लिए हुई है। तुम इस कमल से उत्पन्न हुए हो, और तुम्हारा कार्य अब इस संसार की रचना करना है। तुम अपनी तपस्या और ज्ञान से इस कार्य को पूर्ण करोगे। मेरी कृपा सदैव तुम्हारे साथ रहेगी।" यह सुनकर ब्रह्मा जी का हृदय कृतज्ञता से भर गया। उन्होंने भगवान विष्णु को धन्यवाद दिया और सृष्टि के निर्माण के कार्य में जुट गए। भगवान विष्णु ने उन्हें सृष्टि के निर्माण के लिए आवश्यक ज्ञान और शक्ति प्रदान की, और वे अंतर्ध्यान हो गए।
सनकादि ऋषियों का जन्म
सृष्टि के निर्माण के लिए ब्रह्मा जी ने अनेक मानस पुत्रों को उत्पन्न किया, जिनमें सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार प्रमुख थे। ये चारों ऋषि बाल ब्रह्मचारी थे और संसारिक सुखों से विरक्त थे। ब्रह्मा जी ने उनसे सृष्टि के विस्तार में सहायता करने के लिए कहा, परंतु उन्होंने मोक्ष मार्ग का अनुसरण करने का निर्णय लिया और भगवान विष्णु की भक्ति में लीन हो गए। ब्रह्मा जी अपने पुत्रों की इस उदासीनता से चिंतित हुए और उनके मन में क्रोध उत्पन्न हुआ, जिससे रुद्र का जन्म हुआ। इस क्रोध से बचने के लिए भगवान विष्णु ने उन्हें शांत रहने का आदेश दिया।
अध्याय 1 का सार: इस अध्याय में हमने जाना कि कैसे प्रलय के बाद भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया, उन्हें सृष्टि की रचना का भार सौंपा और ब्रह्मा जी ने कैसे सनकादि ऋषियों को जन्म दिया। यह हमें सिखाता है कि भगवान की इच्छा से ही सृष्टि का आरंभ होता है और उनकी कृपा से ही सब कुछ संभव है। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे पृथ्वी रसातल में चली गई और भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका उद्धार किया।
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