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श्रीमद भागवत पुराण – अध्याय 5: मत्स्य और कूर्म अवतार कथा

Tilak Kathayein13 Apr 2026117 views📖 1 min read
श्रीमद भागवत पुराण
श्रीमद भागवत पुराण का अध्याय 5 — मत्स्य और कूर्म अवतार कथा। प्रलय के समय मत्स्य अवतार में विष्णु द्वारा मनु की रक्षा और कूर्म अवतार में समुद्र मंथन में सहायता।

मत्स्य और कूर्म अवतार कथा

वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि के अहंकार को शांत किया और देवताओं को उनका राज्य वापस दिलाया। परन्तु, देवताओं के लिए चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई थीं। सागर की गहराई में कुछ ऐसा घटित होने वाला था जो पृथ्वी और स्वर्ग दोनों को हिला कर रख देगा। धर्म की रक्षा और अमृत की प्राप्ति के लिए भगवान को फिर से लीला रचानी थी।

प्रलय और मत्स्य अवतार

युगों पूर्व, जब ब्रह्मा जी के एक दिन का अंत होने वाला था, तब सम्पूर्ण पृथ्वी पर जल प्रलय आने लगा। नदियां अपनी सीमाओं से बाहर निकल गईं, सागर उमड़ पड़े और भयानक वर्षा होने लगी। धरती पर जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। ऋषि-मुनि और सामान्यजन सभी जल के प्रकोप से भयभीत थे। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था और सृष्टि के अंत का भय सता रहा था।

ऐसे भयानक समय में, सत्यव्रत नामक एक धर्मात्मा राजा थे, जो भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे नदी में स्नान कर रहे थे, तभी उनकी अंजुली (हथेली) में एक छोटी सी मछली आई। राजा ने सोचा, "यह छोटी सी मछली इस प्रलय में कैसे जीवित रहेगी? मुझे इसकी रक्षा करनी चाहिए।"

मनु की रक्षा और मत्स्य उपदेश

राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। परन्तु, मछली तुरंत बड़ी हो गई। फिर उन्होंने मछली को एक बड़े पात्र में डाला, पर मछली का आकार बढ़ता ही गया। अंत में, राजा ने मछली को नदी में छोड़ दिया। तब मछली ने कहा, "हे राजन! यह नदी मेरे लिए छोटी है। मुझे सागर में ले चलो।"

सागर में छोड़ने पर मछली विशालकाय हो गई और उसने राजा को बताया कि सातवें दिन प्रलय आएगा और सम्पूर्ण पृथ्वी जल में डूब जाएगी। भगवान मत्स्य रूप में प्रकट हुए थे। उन्होंने राजा मनु को एक विशाल नाव बनाने का आदेश दिया और कहा कि सभी प्रकार के बीज, जड़ी-बूटियां और प्राणियों के जोड़े लेकर उस नाव में सवार हो जाएं। भगवान ने नाव को हिमालय पर्वत से बांधने के लिए एक विशाल सर्प भी भेजा।

जब प्रलय आया, तो राजा मनु, सप्तऋषि और सभी जीवों के साथ नाव में सुरक्षित रहे। भगवान मत्स्य ने नाव का मार्गदर्शन किया और प्रलय के अंत तक उन्हें सुरक्षित रखा। प्रलय समाप्त होने पर, भगवान मत्स्य ने वेदों का ज्ञान राजा मनु को दिया, जिससे नई सृष्टि की शुरुआत हो सकी। भगवान की कृपा से धर्म की स्थापना हुई और ज्ञान का प्रकाश फैला।

समुद्र मंथन और कूर्म अवतार

प्रलय के बाद, देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन करने का निर्णय लिया गया। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया, और वासुकि नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया। परन्तु, जैसे ही मंथन शुरू हुआ, मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा। देवताओं और असुरों के प्रयास विफल होते दिख रहे थे।

देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लिया और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर लिया। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल पर्वत स्थिर हो गया और समुद्र मंथन सफलतापूर्वक शुरू हो गया।

समुद्र मंथन से कई दिव्य वस्तुएं निकलीं, जैसे विष (जिसको भगवान शिव ने कंठ में धारण किया), कामधेनु, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी जी और अंत में अमृत निकला। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके असुरों को मोहित कर लिया और देवताओं को अमृत पिला दिया। इस प्रकार देवताओं ने अमरता प्राप्त की और असुर पराजित हुए। भगवान विष्णु ने एक बार फिर धर्म की रक्षा की और सृष्टि को संतुलन प्रदान किया।

धर्म की स्थापना और अगली लीला की प्रतीक्षा

मत्स्य अवतार में भगवान विष्णु ने राजा मनु को प्रलय से बचाया और उन्हें वेदों का ज्ञान दिया। कूर्म अवतार में उन्होंने समुद्र मंथन में सहायता की और देवताओं को अमृत दिलाया। इस प्रकार, भगवान विष्णु युगों-युगों से धर्म की रक्षा करते आ रहे हैं। अब समय था एक और अवतार का, एक ऐसे राजकुमार का जन्म होने का जो धर्म की स्थापना के लिए रावण जैसे शक्तिशाली असुर का अंत करेगा। अगला अध्याय भगवान राम की कथा का वर्णन करेगा, जो अयोध्या में जन्म लेकर धर्म की विजय का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने मत्स्य अवतार में भगवान द्वारा राजा मनु की रक्षा और प्रलय से सृष्टि को बचाने की कथा पढ़ी। फिर हमने कूर्म अवतार में मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करके समुद्र मंथन को सफल बनाया, जिससे देवताओं को अमृत प्राप्त हुआ। इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं।

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