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कुरुक्षेत्र युद्ध कथा – अध्याय 6: युद्ध का आरंभ

Tilak Kathayein12 Apr 202690 views📖 1 min read
कुरुक्षेत्र युद्ध कथा
कुरुक्षेत्र युद्ध कथा का अध्याय 6 — युद्ध का आरंभ। कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होता है, जिसमें दोनों पक्षों के योद्धा वीरता से लड़ते हैं और कई महत्वपूर्ण योद्धा मारे जाते हैं।

युद्ध का आरंभ

भगवत गीता का सार सुनकर अर्जुन का मोह भंग हो गया था। ज्ञान प्राप्त होने के बाद, वह अब अपने कर्तव्य को निभाने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। कुरुक्षेत्र की धरती पर शंखनाद हुआ, और युद्ध का आरंभ हो गया। दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, मानो दो विशाल सागर टकराने को आतुर हों।

भीष्म पितामह का नेतृत्व

कौरवों की सेना का भार भीष्म पितामह के कंधों पर था। उनकी श्वेत दाढ़ी और शांत मुख युद्ध के भयंकर वातावरण में भी शांति का आभास करा रहे थे। वे अपने पराक्रम और न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे। उनके नेतृत्व में कौरव सेना आत्मविश्वास से भरी हुई थी। उनकी ध्वजा पर ताड़ का वृक्ष बना हुआ था, जो महाभारत के युद्ध में उनकी शक्ति का प्रतीक था। उन्होंने अपनी सेना को व्यूह में स्थापित किया और युद्ध के लिए आदेश दिया।

भीष्म पितामह ने उच्च स्वर में कहा, "योद्धाओं, आज धर्म और अधर्म के बीच युद्ध है। अपने कुल, अपनी भूमि और अपने धर्म की रक्षा के लिए प्राणपण से युद्ध करो! याद रखो, सत्य हमेशा विजयी होता है!" उनके शब्द सेना में उत्साह का संचार कर गए और वे गरजते हुए आगे बढ़े।

अभिमन्यु का चक्रव्यूह

युद्ध के तीसरे दिन द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की। पांडवों में से केवल अर्जुन और कृष्ण ही चक्रव्यूह को भेदना जानते थे, परंतु उस दिन अर्जुन को युद्ध क्षेत्र से दूर ले जाया गया था। ऐसी परिस्थिति में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु आगे आए। अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश करने का साहस दिखाया, यद्यपि उसे बाहर निकलने का ज्ञान नहीं था।

अभिमन्यु, जिसने अपनी माता के गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदन की कला सीखी थी, ने अपने सारथी से कहा, "हे सारथी, रथ को चक्रव्यूह की ओर ले चलो। भले ही मैं वापस न आ पाऊं, मुझे अपने कर्तव्य का पालन करना है।" उसने चक्रव्यूह में प्रवेश किया और कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया।

भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाया, "चिंता न करें, धर्मराज। अभिमन्यु वीर है और वह अकेला ही कौरव सेना को पराजित करने में सक्षम है। परंतु याद रखें, अभिमन्यु को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। हमें उसका समर्थन करना होगा, चाहे जो भी हो।"

अर्जुन का क्रोध

जब अर्जुन को पता चला कि अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया है और कौरवों ने मिलकर उसका वध कर दिया है, तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उनका हृदय शोक और क्रोध से भर गया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि कल सूर्य अस्त होने से पहले वे जयद्रथ का वध कर देंगे, अन्यथा वे स्वयं अग्नि समाधि ले लेंगे। जयद्रथ, जिसने अभिमन्यु को चक्रव्यूह से बाहर निकलने से रोका था, अर्जुन के क्रोध का कारण था।

अर्जुन ने तीव्र स्वर में कहा, "हे कृष्ण, यह अन्याय है! उन्होंने मेरे पुत्र को धोखे से मारा है। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि कल सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध कर दूंगा, अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूंगा!" अर्जुन का क्रोध इतना तीव्र था कि देवताओं को भी चिंता होने लगी। युद्ध अब और भी भयानक रूप लेने वाला था। यह प्रतिज्ञा एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाली थी। यह अध्याय कुरुक्षेत्र के भीषण युद्ध के आरंभ का साक्षी है, जहाँ प्रेम, कर्तव्य और क्रोध के बीच संघर्ष चरम पर है।

अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में महाभारत युद्ध का आरंभ होता है, जिसमे भीष्म पितामह कौरवों का नेतृत्व करते हैं और अभिमन्यु चक्रव्यूह में वीरगति को प्राप्त होते हैं। अर्जुन अपने पुत्र की मृत्यु से क्रोधित होकर जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा करते हैं, जिससे युद्ध और भी तीव्र हो जाता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि क्रोध और शोक में भी धर्म का पालन करना चाहिए और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए।

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आज का पंचांग 1 अगस्त 2026

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