गणेश चतुर्थी व्रत कथा – अध्याय 3: चंद्रमा का शाप और प्रायश्चित

चंद्रमा का शाप और प्रायश्चित
पिछले अध्याय में, हमने देखा कि कैसे माता पार्वती ने अपने पुत्र गणेश को गजमुख प्रदान किया और कैसे गणेश ने सभी देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त किया। अब, हम उस घटना की ओर बढ़ते हैं जिसने गणेश चतुर्थी व्रत को और भी महत्वपूर्ण बना दिया - चंद्रमा द्वारा गणेश का उपहास और उसके परिणामस्वरूप मिला शाप।
चंद्रलोक में हास्य
गजमुख धारण करने के बाद, गणेश अपनी माता पार्वती और पिता शिव के साथ कैलाश पर्वत पर विराजमान थे। उनकी आभा अद्भुत थी, और सभी देवता, ऋषि-मुनि उन्हें नमन कर रहे थे। देवलोक में भी उनका आगमन एक उत्सव के समान मनाया जा रहा था। उसी समय, चंद्रमा, जो अपनी सुंदरता और शीतल किरणों के लिए जाने जाते थे, आकाश में अपनी गति से विचरण कर रहे थे। उनकी दृष्टि कैलाश पर्वत पर पड़ी, जहाँ गणेश अपनी शोभा से प्रकाशमान थे।
चाँद ने गणेश के गजमुख रूप को देखा और अपनी हंसी रोक नहीं पाए। उन्होंने मन ही मन सोचा, "कैसा विचित्र रूप है! हाथी का मुख, मानव शरीर... यह तो बड़ा ही हास्यास्पद है।" उनकी यह हंसी केवल मन में ही नहीं रही, बल्कि उनके चेहरे पर भी झलकने लगी।
गणेश का क्रोध और शाप
गणेश, जो अंतर्यामी थे, चंद्रमा की हंसी और उसके उपहास पूर्ण भाव को तत्काल समझ गए। उन्हें चन्द्रमा के अभिमान पर बहुत क्रोध आया। उनका मुख क्रोध से लाल हो गया, और उनकी आँखें अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठीं। उन्होंने चंद्रमा से कहा, "हे चंद्र! तुम अपनी सुंदरता और रूप पर इतना गर्व करते हो कि तुम दूसरों का अपमान करने से भी नहीं हिचकिचाते। आज से, जो भी तुम्हें देखेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा।"
गणेश का शाप सुनते ही, चंद्रमा भयभीत हो गए। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तुरंत गणेश के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। उन्होंने कहा, "हे गणनायक! मुझसे भूल हो गई। मै अपने अभिमान में अंधा हो गया था। कृपया मुझे क्षमा करें। मुझ पर दया किजीये।" चंद्रलोक में हाहाकार मच गया। सभी देवता चिंतित हो गए।
श्राप से मुक्ति की प्रार्थना
चंद्रमा की दीनता और पश्चाताप देखकर, गणेश का हृदय कुछ पिघला। उन्होंने कहा, "मेरा शाप पूरी तरह से वापस नहीं लिया जा सकता, क्योंकि वह अटल है। लेकिन, मैं इसका प्रभाव थोड़ा कम कर सकता हूँ। वर्ष में एक दिन, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो कोई भी तुम्हें देखेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा। परन्तु जो व्यक्ति उस दिन गणेश चतुर्थी का व्रत रखेगा और मेरी पूजा करेगा, वह उस झूठे आरोप से मुक्त हो जाएगा। "
गणेश की कृपा से चंद्रमा को राहत मिली। उन्होंने उस दिन से ही गणेश की भक्ति और आराधना शुरू कर दी। सभी देवताओं ने भी गणेश की महिमा को समझा और उनके शाप को हल्के में न लेने का निश्चय किया। गणेश का यह क्रोध, वास्तव में, चंद्रलोक के अभिमान को चूर करने और धरती पर गणेश चतुर्थी व्रत के महत्व को स्थापित करने के लिए ही था। अब, हम आगे की कथा में जानेंगे कि कैसे धरती पर गणेश चतुर्थी व्रत का आरंभ हुआ।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में, हमने देखा कि कैसे चंद्रमा ने गणेश का उपहास किया और परिणामस्वरूप उन्हें शाप मिला। गणेश ने चंद्रमा को वर्ष में एक दिन झूठे आरोपों से ग्रसित रहने का शाप दिया, लेकिन गणेश चतुर्थी व्रत करने वालों को इससे मुक्ति का मार्ग भी बताया। इस घटना से अभिमान का त्याग और क्षमा की महत्ता का बोध होता है।
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