कुरुक्षेत्र युद्ध कथा – अध्याय 3: सेनाओं का समागम

सेनाओं का समागम
पिछले अध्याय में, भगवान कृष्ण का शांति प्रस्ताव धृतराष्ट्र के अहंकार और दुर्योधन की हठधर्मिता के कारण विफल हो गया। अब, युद्ध अनिवार्य था। दोनों पक्षों की सेनाएँ कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ने लगीं, एक विनाशकारी संघर्ष के लिए तैयार, जो युगों तक याद रखा जाएगा।
कुरुक्षेत्र में योद्धाओं का आगमन
कुरुक्षेत्र का मैदान, जो कभी ऋषि-मुनियों का शांत आश्रय हुआ करता था, अब योद्धाओं के कोलाहल और रथों की गर्जना से गूंज उठा। दूर-दूर के राज्यों से आए योद्धा, अपने-अपने धड़ों के झंडे लिए, मानो मौत को निमंत्रण दे रहे हों। धृतराष्ट्र के पुत्र, कौरव, अपनी विशाल सेना के साथ, गर्व से भरे आगे बढ़ रहे थे, उन्हें अपनी संख्या बल पर अटूट विश्वास था। पांडवों की सेना, यद्यपि कौरवों से छोटी थी, परन्तु धर्म और सत्य के लिए लड़ने के संकल्प से भरी हुई थी। उनकी आँखों में न्याय की ज्वाला धधक रही थी, जो किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तत्पर थी।
युधिष्ठिर ने भीम से कहा, “भीमसेन, यह युद्ध हमारे लिए नहीं, धर्म की स्थापना के लिए है। हमें यह याद रखना होगा कि हम न्याय के लिए लड़ रहे हैं, क्रोध या लोभ के लिए नहीं।” भीम ने उत्तर दिया, "भ्राता युधिष्ठिर, मैं आपका आदेश शिरोधार्य करता हूँ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होऊंगा, परन्तु दुष्टों का संहार अवश्य करूँगा।"
युद्ध नियमों का निर्धारण
युद्ध प्रारंभ होने से पहले, दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने मिलकर युद्ध के कुछ नियम निर्धारित किए, ताकि कम से कम अत्याचार को कम किया जा सके। यह निर्णय लिया गया कि निहत्थे पर वार नहीं किया जाएगा, रथियों को रथियों से ही लड़ना होगा, पैदल सैनिकों को पैदल सैनिकों से, और सूर्यास्त के बाद युद्ध रोक दिया जाएगा। घायल योद्धाओं की सहायता की जाएगी और किसी भी प्रकार के छल या धोखे का सहारा नहीं लिया जाएगा। वृद्ध पितामह भीष्म ने इन नियमों पर विशेष बल दिया, हालाँकि उन्हें यह भी ज्ञात था कि युद्ध में नियमों का पालन हमेशा संभव नहीं होता।
भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाया, "युधिष्ठिर, नियम केवल आदर्श हैं। युद्ध एक ऐसी अवस्था है जहाँ नैतिकता का उल्लंघन अक्सर होता है। हमें अपनी आत्मा की पवित्रता बनाए रखनी है, भले ही हमारे शत्रु ऐसा न करें।" उनकी वाणी में करुणा थी, लेकिन साथ ही कर्तव्य का भार भी था। कृष्ण जानते थे कि यह युद्ध सिर्फ एक युद्ध नहीं है, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच का एक महासंग्राम है, जिसमें सभी नियमों को ताक पर रख दिया जाएगा।
अर्जुन का मोह
जैसे ही युद्ध की घोषणा हुई और दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हुईं, अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठाया और अपने विरोधियों को देखा। उसने देखा कि उसके अपने गुरु द्रोणाचार्य, उसके पितामह भीष्म, और उसके चचेरे भाई, कौरव, सभी युद्ध के लिए तत्पर खड़े थे। अपने ही परिजनों और गुरुजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने के विचार मात्र से अर्जुन का हृदय काँप उठा। उसका मन मोह से भर गया, और उसे युद्ध की निरर्थकता का अनुभव होने लगा। उसका गांडीव हाथ से छूटने लगा।
अर्जुन ने कृष्ण से कातर स्वर में कहा, "हे केशव, मैं अपने गुरुजनों और परिजनों पर कैसे वार कर सकता हूँ? मुझे यह युद्ध नहीं चाहिए। मुझे राज्य, सुख, और विजय की कोई अभिलाषा नहीं है, अगर मुझे अपने प्रियजनों की हत्या करके यह सब प्राप्त करना पड़े।" उसकी आँखों में आँसू भर आए, और वह मोहवश कर्तव्यविमुख हो गया। अर्जुन विषाद में डूब गया, अब अगला अध्याय बताएगा कि कृष्ण उसे इस विषाद से कैसे मुक्त करते हैं।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं का आगमन और युद्ध के नियमों का निर्धारण वर्णित है। अर्जुन अपने परिजनों के विरुद्ध युद्ध करने के विचार से मोहग्रस्त हो जाते हैं, जो उन्हें विषाद की ओर धकेलता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म के मार्ग पर अडिग रहना कितना आवश्यक है, भले ही यह कितना भी कष्टदायक क्यों न हो।
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