कुरुक्षेत्र युद्ध कथा – अध्याय 1: युद्ध के बादल

युद्ध के बादल
इंद्रप्रस्थ की महिमा दिनों दिन बढ़ रही थी। युधिष्ठिर के धर्मराज के रूप में प्रतिष्ठित होने से प्रजा सुख और शांति से जी रही थी। पर यह सुख चिरस्थायी नहीं था, क्योंकि हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठे धृतराष्ट्र के मन में मोह और पुत्र मोह का अंधकार छाया हुआ था, जिसकी वजह से कुरुक्षेत्र के युद्ध के बादल मंडराने लगे थे।
धृतराष्ट्र का अंतर्द्वंद्व
धृतराष्ट्र अपनी राजसभा में बैठे थे, पर उनका मन इंद्रप्रस्थ में ही अटका हुआ था। उन्हें बार-बार विदुर की कही बातें याद आ रही थीं, जिसमें उन्होंने युधिष्ठिर की न्यायप्रियता और प्रजा के प्रति समर्पण का वर्णन किया था। वह जानते थे कि युधिष्ठिर धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ेंगे, लेकिन उनका पुत्रमोह उन्हें अंधे बना रहा था। उनके मन में ईर्ष्या की एक ज्वाला धधक रही थी, जिसे वे बुझा नहीं पा रहे थे। उनके नेत्रहीन होने के कारण भी उन्हें यह भय सता रहा था कि कहीं उनका राजपाट पाण्डवों के हाथों में न चला जाए।
धृतराष्ट्र ने अपने आप से कहा, "क्या मैं अपने पुत्रों के भविष्य को खतरे में डाल रहा हूँ? क्या मेरा मोह मुझे सही निर्णय लेने से रोक रहा है? नहीं, मुझे अपने पुत्रों के लिए सोचना होगा, उनके भविष्य की रक्षा करनी होगी। चाहे इसके लिए मुझे कोई भी मार्ग चुनना पड़े।"
द्रौपदी का अपमान और दुर्योधन की ईर्ष्या
युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी राजाओं और राजकुमारों को आमंत्रित किया गया था। दुर्योधन भी अपने मामा शकुनि के साथ इंद्रप्रस्थ आया। इंद्रप्रस्थ की अद्भुत माया देखकर दुर्योधन आश्चर्यचकित रह गया। उसे हर जगह वैभव और सौंदर्य दिखाई दे रहा था, जो हस्तिनापुर में भी दुर्लभ था। एक बार वह मायावी महल में भ्रमित होकर एक जलाशय में गिर गया, जिसे उसने फर्श समझ लिया था। द्रौपदी और अन्य दासियों ने उसे देखकर उपहास किया। द्रौपदी ने व्यंग्य करते हुए कहा, "अंधे का पुत्र अंधा ही होता है।" इस अपमान से दुर्योधन क्रोध से भर गया।
दुर्योधन के मन में ईर्ष्या की आग और भी भड़क उठी। उसे लगा कि पाण्डव उसका अपमान कर रहे हैं और उसे नीचा दिखा रहे हैं। तभी कृष्ण ने अपनी लीला दिखाई। उन्होंने दुर्योधन के कानों में कहा, "यह अपमान नहीं, नियति का संकेत है। धर्म का मार्ग चुनो और शांति स्थापित करो।" पर दुर्योधन के मन में तो प्रतिशोध की भावना घर कर चुकी थी। इस अपमान को वह कभी नहीं भूल पाया और यही अपमान कुरुक्षेत्र युद्ध का कारण बना। शकुनि ने इस अपमान को दुर्योधन के मन में और बढ़ा दिया और बदला लेने के लिए उकसाया।
युद्ध की ओर
दुर्योधन के मन में ईर्ष्या और प्रतिशोध की भावना ने जन्म ले लिया था। वह किसी भी कीमत पर पाण्डवों से बदला लेना चाहता था। उसने शकुनि के साथ मिलकर पाण्डवों को जुए में हराने की योजना बनाई। धृतराष्ट्र भी पुत्रमोह में अंधे होकर इस षड्यंत्र में शामिल हो गए। धीरे-धीरे कुरुक्षेत्र के युद्ध के बादल गहराने लगे। अब देखना यह था कि श्रीकृष्ण इस भयानक युद्ध को रोकने के लिए क्या प्रयास करते हैं। अगला अध्याय श्रीकृष्ण के शांति प्रस्ताव पर केंद्रित होगा।
अध्याय 1 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे धृतराष्ट्र का मोह और दुर्योधन की ईर्ष्या कुरुक्षेत्र युद्ध का कारण बनी। द्रौपदी के अपमान ने दुर्योधन के मन में प्रतिशोध की भावना को और भी प्रबल कर दिया। इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मोह और ईर्ष्या विनाश का कारण बनते हैं और हमें इनसे दूर रहना चाहिए।
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