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भस्मासुर वध कथा – अध्याय 4: मोहिनी का नृत्य और छल

Tilak Kathayein12 Apr 202677 views📖 1 min read
भस्मासुर वध कथा
भस्मासुर वध कथा का अध्याय 4 — मोहिनी का नृत्य और छल। भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर को मोहित करते हैं और उसे स्वयं के विनाश के लिए प्रेरित करते हैं।

मोहिनी का नृत्य और छल

पिछले अध्याय में देवताओं ने भगवान विष्णु से भस्मासुर के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना सुनी और आश्वासन दिया कि वे शीघ्र ही कोई उपाय निकालेंगे। अब यह अध्याय दिखाता है कि किस प्रकार भगवान विष्णु, मोहिनी का रूप धारण करके, भस्मासुर का वध करते हैं।

विष्णु का मोहिनी रूप

देवताओं की विनती सुनकर, भगवान विष्णु का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने क्षण भर सोचा और फिर दिव्य मुस्कान के साथ कहा, "देवताओं, तुम चिंता मत करो। मैं भस्मासुर के गर्व को चूर-चूर कर दूंगा। मैं एक ऐसी युक्ति का प्रयोग करूंगा, जिससे वह स्वयं ही अपने विनाश का कारण बनेगा।" यह कहते हुए भगवान विष्णु अपनी दिव्य शक्ति से एक अद्भुत सुंदरी में परिवर्तित हो गए। उनका रूप ऐसा था, मानो सौंदर्य स्वयं आकार ले रहा हो। उनके नेत्र हिरण के समान चंचल थे, होंठ गुलाब की पंखुड़ियों के समान और चाल मदमस्त हाथी के समान।

देवतागण आश्चर्यचकित होकर इस अद्भुत रूप को देख रहे थे। इंद्र ने पूछा, "हे विष्णु, यह अद्भुत रूप क्या है? क्या यह कोई माया है?" विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा, "यह माया नहीं, बल्कि मोहिनी है। मैं इसी रूप में भस्मासुर के सामने प्रकट होऊंगा और उसे अपने रूप- सौंदर्य से मोहित कर लूंगा।" उनके मन में भस्मासुर के प्रति कोई द्वेष नहीं था, केवल देवताओं और संसार को बचाने की करुणा थी। वे जानते थे कि छल के बिना उस राक्षस को हराना असंभव है।

मोहिनी का नृत्य प्रदर्शन

मोहिनी बनी विष्णु भस्मासुर के सामने प्रकट हुईं। मोहिनी को देखकर भस्मासुर अचंभित रह गया! उसने ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था। मोहिनी ने अपनी मधुर आवाज में कहा, "हे वीर, मैंने तुम्हारी शक्ति और वीरता के बारे में बहुत सुना है। मैं तुम्हारे नृत्य कौशल को देखना चाहती हूँ।" भस्मासुर, मोहिनी के सौंदर्य में पूरी तरह खो चुका था, तुरंत बोला, "हे सुंदरी, मैं तो तुम्हारा दास हूँ। तुम जो कहोगी, मैं वही करूंगा।"

मोहिनी ने नृत्य शुरू किया। उनका हर कदम, हर भाव, हर अंग-संचालन ऐसा था, मानो कोई दिव्य अप्सरा नृत्य कर रही हो। भस्मासुर पूरी तरह से सम्मोहित होकर उन्हें देख रहा था। मोहिनी ने जानबूझकर कुछ ऐसे आसन किए, जो बड़े कठिन थे। उसने अपने हाथों को सिर पर रखा और फिर अपने ही सिर पर हाथ रखकर नृत्य करने को कहा। भगवान शिव की उस पर कृपा थी कि वे जानते थे कि यह सब नाटक है और अंततः धर्म की विजय होगी।

भस्मासुर का विनाश

मोहिनी के कहने पर भस्मासुर ने भी उसी तरह नृत्य करने का प्रयास किया। उसने मोहिनी की नकल करते हुए अपने हाथ को अपने सिर पर रखा। जैसे ही उसने ऐसा किया, उसकी वह शक्ति, जो उसने भगवान शिव से प्राप्त की थी, सक्रिय हो गई और वह स्वयं ही भस्म हो गया! पल भर में वह शक्तिशाली राक्षस राख के ढेर में बदल गया।

देवताओं ने स्वर्ग से जय-जयकार की। भगवान विष्णु की जय! मोहिनी की जय! अंततः, उनके छल ने भस्मासुर के आतंक से मुक्ति दिलाई। शिव का आशीर्वाद, जो भस्मासुर के लिए विनाशकारी था, अंततः देवताओं के लिए मुक्ति का कारण बना। विष्णु ने अपने वचन का पालन किया और देवताओं को भस्मासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाई।

अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण करके भस्मासुर को छल से मारा। इस कहानी का आध्यात्मिक सार यह है कि गर्व और अहंकार का अंत हमेशा विनाशकारी होता है, और भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, भले ही उन्हें किसी छल का सहारा ही क्यों न लेना पड़े।

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आज का पंचांग 1 अगस्त 2026

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