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भस्मासुर वध कथा – अध्याय 5: विजय और दिव्य व्यवस्था

Tilak Kathayein12 Apr 202666 views📖 1 min read
भस्मासुर वध कथा
भस्मासुर वध कथा का अध्याय 5 — विजय और दिव्य व्यवस्था। मोहिनी द्वारा भस्मासुर का वध होता है, जिससे देवताओं और ऋषि मुनियों में शांति स्थापित होती है, और धर्म की पुनः स्थापना होती है।

विजय और दिव्य व्यवस्था

मोहिनी के अद्भुत नृत्य और चतुराईपूर्ण छल से भस्मासुर मोहित हो चुका था। अपनी शक्ति के मद में चूर, वह यह भी नहीं समझ पाया कि वह स्वयं अपने विनाश की ओर बढ़ रहा है। उसका अंत अब निकट था, और देवताओं की आशा की किरण अब प्रबल होने लगी थी।

भस्मासुर का अंतिम अहंकार

मोहिनी के जैसे ही उसने अपने ही सिर पर हाथ रखा, भस्मासुर का शरीर एक प्रचंड ज्वाला से घिर गया। उसकी आँखें भय और आश्चर्य से फैल गईं। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ, पर अब बहुत देर हो चुकी थी। अग्नि की लपटें उसे अंदर ही अंदर जलाने लगीं, उसके शक्तिशाली शरीर को राख के ढेर में बदलने लगीं। उसका भयानक चीत्कार पूरे वातावरण में गूंज उठा, जो उसकी मूर्खता और विनाश का प्रतीक था।

"यह...यह क्या हो रहा है?" भस्मासुर चिल्लाया, उसकी आवाज़ दर्द और निराशा से भरी हुई थी। "मोहिनी! यह तुमने क्या किया? मैंने तो तुम्हें पाने की अभिलाषा की थी!" उसके शब्द राख में बदल गए, उसकी सारी शक्ति और अहंकार एक पल में भस्म हो गए।

देवताओं की स्तुति

जैसे ही भस्मासुर का शरीर राख में बदल गया, स्वर्ग में देवताओं ने आनंद से जयजयकार किया। वे अपने- अपने स्थानों से उठ खड़े हुए और भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। उनके हृदय कृतज्ञता से भर गए, क्योंकि उन्होंने अपनी आंखों के सामने धर्म की स्थापना देखी थी। ढोल नगाड़े बज उठे, और अप्सराएं दिव्य नृत्य करने लगीं। चारों दिशाओं में शांति और सद्भाव का वातावरण छा गया था।

इंद्र ने हाथ जोड़कर कहा, "हे विष्णु, आपकी लीला अपरंपार है! आपने अपनी मोहिनी रूप से भस्मासुर का वध करके देवताओं और धर्म की रक्षा की है। आपकी जय हो!" अन्य देवताओं ने भी एक स्वर में विष्णु की स्तुति की, "जय विष्णु! जय मोहिनी!"

धर्म की पुनर्स्थापना

भस्मासुर के अंत के साथ, संसार में धर्म की पुनर्स्थापना हुई। ऋषि और मुनि, जो भय से जंगलों में छिप गए थे, वापस अपने आश्रमों में लौट आए। उन्होंने फिर से वेद मंत्रों का उच्चारण शुरू कर दिया, और यज्ञों की अग्नि प्रज्वलित हो उठी। लोगों के हृदयों में फिर से आशा और विश्वास का संचार हुआ। भगवान शिव भी प्रसन्न हुए, क्योंकि उनकी दी हुई शक्ति का दुरुपयोग करने वाले का अंत हो गया था। उन्होंने विष्णु और मोहिनी की लीला को आशीर्वाद दिया।

भगवान शिव ने कहा, "विष्णु, तुमने धर्म की रक्षा के लिए जो किया, वह सदैव याद रखा जाएगा। तुम्हारा यह रूप, मोहिनी, संसार को यह सिखाएगा कि अहंकार और शक्ति का दुरुपयोग हमेशा विनाशकारी होता है। धर्म की जय हो!"

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके भस्मासुर का वध किया और धर्म की स्थापना की। यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और शक्ति के दुरुपयोग का परिणाम हमेशा विनाशकारी होता है, और धर्म की रक्षा के लिए भगवान हमेशा उपस्थित रहते हैं।

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