
Chapter 8 : Aksara Brahma Yoga – अध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोग
अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ अर्जुनने कहा- हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत…
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अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ अर्जुनने कहा- हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत…

श्रीभगवानुवाच मव्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ श्रीभगवान् बोले- हे पार्थ! अनन्यप्रेमसे मुझमें आसक्तचित्त तथा अनन्यभावसे मेरे परायण होकर योगमें लगा हुआ तू जिस…

महाराष्ट्र के नासिक जिले में ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी और पवित्र गोदावरी नदी के उद्गम स्थल पर स्थित त्र्यंबकेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 पावन ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस ज्योतिर्लिंग की अद्वितीय विशेषता यह है कि यहाँ शिवलिंग में तीन मुख हैं, जो त्रिदेव—भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान रुद्र (महेश) के प्रतीक माने जाते हैं। शिव पुराण के अनुसार, महर्षि गौतम की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव यहाँ प्रकट हुए थे। यह पवित्र धाम कालसर्प दोष और नारायण नागबलि पूजा के लिए भी देश-विदेश में प्रसिद्ध है।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो । पायो जी मैंने राम रतन धन पायो । वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु । कृपा कर अपनायो ॥ पायो जी मैंने राम रतन...

श्रीभगवानुवाच: अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ श्रीभगवान् बोले- जो पुरुष कर्मफलका आश्रय न लेकर करनेयोग्य कर्म करता है, वह सन्यासी है और योगी भी है, केवल अग्निहोत्र न करनेवाला या कर्म न करनेवाला सन्यासी नहीं है।

मीराबाई को भगवान कृष्ण का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। मीराबाई ने जीवन भर भगवान कृष्ण की भक्ति की और कहा जाता है कि उनकी मृत्यु भी…

महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है। इस दिन व्रत रखकर भक्त भगवान शिव की आराधना करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करते हैं।...

संतोषी माता व्रत और कथा का पालन भारत में बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। यह व्रत मुख्यतः शुक्रवार को किया जाता है और इसे करने से...

अर्जुन उवाच: सन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मोंके संन्यासकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। इसलिये इन…

भगवद गीता का चौथा अध्याय “ज्ञान कर्म संन्यास योग” है। इसमें श्री कृष्ण ने आत्मज्ञान, निष्काम कर्म और दिव्य ज्ञान के माध्यम से कर्तव्यों के निर्वहन को समझाया है। श्रीभगवानुवाच:…

भगवद गीता का तीसरा अध्याय “कर्म योग” पर आधारित है, जिसमें श्री कृष्ण ने कर्म करने, बिना फल की चिंता किए, अपने धर्म का पालन करने और आत्म-निर्भरता की महत्ता…

संजय बोले- उस प्रकार करुणासे व्याप्त और आँसुओंसे पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रोंवाले शोकयुक्त उस अर्जुनके प्रति भगवान् मधुसूदनने यह वचन…