सावित्री सत्यवान कथा – अध्याय 4: वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन

वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन
वन में जीवन व्यतीत करते हुए तीन वर्ष बीत चुके थे। सावित्री और सत्यवान का प्रेम अटूट था, परन्तु सावित्री के मन में वह भविष्यवाणी कांटे की तरह चुभती रहती थी। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन और भी निकट आता जा रहा था, जिससे सावित्री की चिंता बढ़ती जा रही थी।
वन की ओर प्रस्थान
सूर्य की स्वर्णिम किरणें आकाश में फैल रही थीं, और पक्षियों का मधुर कलरव वन में गूंज रहा था। सत्यवान, कंधे पर कुल्हाड़ी रखे, वन की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार थे। उनकी आँखों में उत्साह था, और उनके मुख पर शांत मुस्कान थी। सावित्री, अपनी आँखों में छिपे डर को दबाते हुए, सत्यवान को देख रही थीं। उसका हृदय भय से कांप रहा था, परन्तु वह अपने पति को दुखी नहीं करना चाहती थी। उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह सत्यवान की रक्षा करे।
सावित्री ने सत्यवान से कहा, "प्रिय, आज मेरा मन कुछ व्याकुल है। कृपया अपना ध्यान रखना। मुझे आपकी चिंता हो रही है।" सत्यवान ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "चिंता मत करो, प्रिये। मैं शीघ्र ही वापस आ जाऊंगा। तुम जानती हो, लकड़ी काटे बिना हमारा जीवन कैसे चलेगा?" मन ही मन सावित्री ने सोचा, 'यही चिंता तो मुझे खाए जा रही है, कि यह जीवन कितना अल्प है।'
सत्यवान की व्याकुलता
सत्यवान वन में लकड़ी काट रहे थे। वे स्वस्थ और शक्तिशाली थे, परन्तु दोपहर होते-होते उन्हें अचानक थकान महसूस होने लगी। उनका सिर चक्कर खाने लगा, और उन्हें ऐसा लगने लगा मानो सारा संसार घूम रहा हो। उन्होंने एक पेड़ का सहारा लिया, परन्तु उनकी व्याकुलता बढ़ती ही चली गई। उनके शरीर से पसीना बह रहा था, और वे दर्द से कराह रहे थे।
धीरे-धीरे सत्यवान की चेतना क्षीण होती गई। उन्हें लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें अपनी ओर खींच रही है। यह यमराज का संकेत था, जो सत्यवान के प्राण हरने के लिए आ रहे थे। सत्यवान ने अपनी आँखों में निराशा के साथ सावित्री को पुकारा, मानो उसे अंतिम बार देखना चाहते हों।
सावित्री की गोद में अंतिम श्वास
सावित्री, जो सत्यवान के पीछे-पीछे वन में आई थी, उनकी व्याकुलता को देखकर दौड़कर उनके पास पहुंची। उन्होंने सत्यवान को अपनी गोद में लिटाया। सत्यवान का शरीर ठंडा पड़ रहा था, और उनकी साँसें उखड़ने लगी थीं। सावित्री ने घबराकर सत्यवान के मुख पर पानी छिड़का, परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। सत्यवान की आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं, और उन्होंने सावित्री की गोद में अपने प्राण त्याग दिए। सावित्री का संसार मानो उजड़ गया। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे, परन्तु उसने धैर्य नहीं खोया। उसका प्रेम सत्यवान के लिए इतना गहरा था कि उसने मृत्यु को भी चुनौती देने का निश्चय किया।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में सत्यवान की मृत्यु का वर्णन है, जो सावित्री के जीवन में एक बड़ा आघात था। परन्तु सावित्री के प्रेम और दृढ़ निश्चय ने उसे मृत्यु के देवता यमराज से लड़ने की शक्ति दी। यह हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम मृत्यु से भी अधिक शक्तिशाली होता है और किसी भी परिस्थिति में हार नहीं माननी चाहिए।
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