सावित्री सत्यवान कथा – अध्याय 6: यमराज का वरदान देना | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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सावित्री सत्यवान कथा – अध्याय 6: यमराज का वरदान देना

Tilak Kathayein12 Apr 202663 views📖 1 min read
सावित्री सत्यवान कथा
सावित्री सत्यवान कथा का अध्याय 6 — यमराज का वरदान देना। यमराज सावित्री की भक्ति और बुद्धि से प्रसन्न होकर तीन वरदान देते हैं, जिससे उसका ससुर दृष्टि लौट आती है, उसके पिता को पुत्र मिलता है और उसे सौ पुत्रों की माँ होने का आशीर्वाद मिलता है।

यमराज का वरदान देना

सावित्री की अटूट निष्ठा और प्रेम से विवश होकर यमराज, जो मृत्यु के देवता हैं, अब उसे रोकने के लिए विवश थे। सत्यवान की आत्मा को लिए यमराज आगे बढ़ रहे थे, और सावित्री, पतिव्रता नारी, दृढ़ संकल्प के साथ उनके पीछे-पीछे आ रही थी। उसके त्याग और प्रेम ने यमराज को सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या वह सच में केवल एक साधारण नारी है?

सावित्री की स्तुति

यमराज ने घूमकर सावित्री की ओर देखा। उनका चेहरा, मृत्यु के देवता होने के बावजूद, अब अद्भुत सम्मान और प्रशंसा से भर गया था। सावित्री के नेत्रों में सत्यवान के लिए प्रेम की अटूट ज्वाला जल रही थी, और उसके रोम-रोम से कर्तव्यनिष्ठा की सुगंध आ रही थी। यमराज ने अपने दिव्य कंठ से सावित्री को संबोधित करते हुए कहा, "हे देवी! तुम्हारी भक्ति, तुम्हारा प्रेम, और तुम्हारा संकल्प अद्वितीय है। मैंने आज तक ऐसी पतिव्रता नारी नहीं देखी। तुम्हारे तप से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।"

सावित्री ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “हे यमराज! मैं केवल एक साधारण पत्नी हूँ, जो अपने पति के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर रही हूँ। मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य सत्यवान की सेवा है। मुझे अपने पति से दूर करना, मेरे प्राणों को हरने के समान है।"

वरदानों की शुरुआत

यमराज द्रवित हो उठे। वह जानते थे कि सावित्री की भावनाओं को ठेस पहुँचाना धर्म के विपरीत है। उन्होंने कहा, “हे सावित्री! तुम्हारी निष्ठा से प्रसन्न होकर, मैं तुम्हें एक वरदान देने को तैयार हूँ। परन्तु, ध्यान रहे, मैं तुम्हें सत्यवान के जीवन को लौटा नहीं सकता। तुम मुझसे सत्यवान के जीवन के अतिरिक्त कुछ भी मांग सकती हो।" सावित्री ने तत्क्षण उत्तर दिया, “हे यमराज! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मैं आपसे यह वरदान मांगती हूँ कि मेरे अंधे ससुर ध्युमतसेन को पुनः दृष्टि प्राप्त हो जाए और वे अपना खोया हुआ राज्य फिर से प्राप्त करें।"

यमराज के वरदान और सावित्री की बुद्धिमत्ता

यमराज ने तुरंत कहा, “तथास्तु! हे सावित्री, तुम्हारे ससुर को आज से ही दृष्टि प्राप्त होगी और वह अपने राज्य को कुशलतापूर्वक चलाएंगे।" सावित्री ने यमराज को धन्यवाद दिया, परन्तु वह रुकी नहीं। उसने कहा, "हे यमराज! मैं आपसे एक और वरदान मांगती हूँ। मेरे पिता अश्वपति को कोई पुत्र नहीं है। मैं आपसे यह वरदान मांगती हूँ कि उन्हें एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हो।" यमराज ने फिर कहा, "तथास्तु! तुम्हारे पिता को शीघ्र ही एक पुत्र प्राप्त होगा।" सावित्री ने कृतज्ञता से सिर झुकाया, फिर बोली, "हे यमराज! अब मेरा अंतिम वरदान है। मैं आपसे यह वरदान मांगती हूँ कि मुझे सत्यवान से सौ तेजस्वी पुत्रों की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो।"

वरदानों का चक्र और सत्यवान का पुनर्जन्म

यमराज कुछ पलों के लिए चकित रह गए। सावित्री की बुद्धिमत्ता देखकर वे दंग रह गए। उन्होंने अनुभव किया कि सावित्री ने शब्दों के जाल में उन्हें बांध लिया है। सत्यवान के बिना सावित्री माँ कैसे बन सकती थी? यमराज ने विवश होकर कहा, "तथास्तु! हे सावित्री, तुम्हें सत्यवान से सौ पुत्रों की प्राप्ति होगी।" और उसी क्षण, यमराज के हाथ से सत्यवान की आत्मा मुक्त हो गई। सत्यवान पुनः जीवित हो उठे। यमराज अंतर्ध्यान हो गए, और सावित्री अपने प्यारे पति के साथ खुशी-खुशी वन की ओर चल दी, जहाँ भाग्य उनके लिए एक नया सवेरा लेकर आया था। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे सावित्री और सत्यवान का प्रेम उनके जीवन को एक नया आयाम देता है।

अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि सावित्री की अटूट भक्ति और बुद्धि ने यमराज को वरदान देने के लिए विवश कर दिया। सावित्री ने अपने ससुर के लिए दृष्टि, अपने पिता के लिए पुत्र और खुद के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा, जिससे अंततः सत्यवान का पुनर्जन्म संभव हो पाया। यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति और बुद्धिमत्ता से बड़ी से बड़ी बाधाओं को भी पार किया जा सकता है।

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