लंका विजय कथा – अध्याय 6: सीता की खोज

सीता की खोज
हनुमान की भक्ति और राम के प्रति अटूट समर्पण ने उन्हें असीम शक्ति प्रदान की थी। जिस प्रकार सागर, विष्णु भगवान का चरण स्पर्श करता है, उसी प्रकार हनुमान राम के चरणों का स्पर्श कर लंका की ओर उड़ने के लिए तैयार थे। पिछले अध्याय में हमने देखा कि कैसे हनुमान ने अपनी शक्ति पहचानी, अब हम देखेंगे कि कैसे वे सीता माता की खोज में सफलता प्राप्त करते हैं।
समुद्र लांघना
हनुमान ने महेंद्र पर्वत पर खड़े होकर, अपने हृदय में राम का नाम बसाया। पवनपुत्र ने लंबी सांस ली, और "जय श्री राम!" का नारा लगाते हुए उन्होंने छलांग लगाई। उनका शरीर हवा में एक विशाल पक्षी की भांति तैरने लगा। नीचे गहरा समुद्र था, जिसकी लहरें गरज रही थीं। समुद्र में रहने वाली नाग माता सुरसा ने उनकी परीक्षा लेने के लिए अपना विशाल मुख खोला, पर हनुमान ने चतुराई से उसके मुख में प्रवेश कर तुरंत बाहर निकलकर उसे प्रणाम किया। राम काज में विघ्न डालने वाली सिंहिका नामक राक्षसी को भी उन्होंने मार गिराया।
हनुमान मन ही मन बोले, "हे राम, आपकी कृपा से ही मैं यह कठिन कार्य कर पा रहा हूँ। यह शरीर, यह शक्ति, सब आपकी ही देन है। मुझे सीता माता का पता लगाना है और उन्हें आपके विरह का संदेश देना है। मुझे उनके दुःख को कम करना है, यही मेरा संकल्प है।"
अशोक वाटिका में सीता से भेंट
लंकेश की स्वर्ण नगरी में प्रवेश कर, हनुमान ने सूक्ष्म रूप धारण कर लिया, जिससे कोई उन्हें देख न सके। उन्होंने हर जगह सीता को खोजा, अंत में उन्हें अशोक वाटिका में पाया। सीता एक वृक्ष के नीचे बैठी थीं, उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी। रावण उन्हें डरा रहा था, धमका रहा था कि वह राम को भूल जाए और उससे विवाह कर ले। त्रिजटा नामक राक्षसी ने सीता माता को सांत्वना दी और रावण को फटकारा। हनुमान ने राम की मुद्रिका सीता के सामने डाली।
"माता," हनुमान ने विनम्र स्वर में कहा, "मैं राम का सेवक हूँ। उन्होंने मुझे आपको यह मुद्रिका दी है और आपके कुशल-क्षेम का समाचार जानने के लिए भेजा है।" सीता ने आश्चर्य से ऊपर देखा, फिर राम की मुद्रिका को पहचानकर उनकी आंखों में आशा की किरण चमक उठी। उन्होंने हनुमान से राम के बारे में पूछा, उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा, और यह भी पूछा कि वे लंका कब आएंगे। हनुमान ने उन्हें धैर्य बंधाया और कहा कि राम शीघ्र ही अपनी वानर सेना के साथ लंका आएंगे और रावण का वध करके उन्हें वापस ले जाएंगे।
लंका दहन
हनुमान ने सीता माता से विदा ली और रावण के सैनिकों को पकड़ने दिया। जब उन्हें रावण के दरबार में ले जाया गया, तो रावण ने उन्हें मृत्युदंड देने का आदेश दिया। विभीषण ने रावण को समझाया कि दूत को मारना नीति के विरुद्ध है। तब रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। जैसे ही हनुमान की पूंछ में आग लगी, उन्होंने अपना विशाल रूप धारण कर लिया और पूरी लंका में आग लगा दी। सोने की लंका धू-धू कर जलने लगी।
राम की शक्ति से हनुमान को कोई हानि नहीं हुई। उन्होंने पूरी लंका को जलाकर राख कर दिया, केवल विभीषण का घर छोड़कर। फिर हनुमान सीता माता के पास वापस गए और उनसे आशीर्वाद लिया। उन्होंने समुद्र पार कर वापस राम के पास लौटकर उन्हें सीता माता का संदेश सुनाया और लंका की स्थिति बताई। राम ने हनुमान को गले लगाया और उनकी वीरता की प्रशंसा की। अब लंका पर आक्रमण करने और सीता को वापस लाने की तैयारी शुरू हो गई।
अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में हनुमान जी ने समुद्र लांघकर सीता माता का पता लगाया, उन्हें राम का संदेश दिया, और लंका दहन किया। यह दिखाता है कि भक्ति और विश्वास से कठिन से कठिन कार्य भी संभव हो जाते हैं। हनुमान का यह कार्य हमें सिखाता है कि हमें हमेशा अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहना चाहिए।
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