लंका विजय कथा – अध्याय 7: सेतु बंधन

सेतु बंधन
सीता माता का पता लगने के बाद हनुमान जी भगवान राम के पास लौट आए। उनकी विजय गाथा सुनकर राम जी का हृदय हर्ष से भर गया। अब लंका पर चढ़ाई करने का समय आ गया था, परन्तु विशाल समुद्र एक बड़ी बाधा थी। इस बाधा को पार करने के लिए ही अब सेतु बांधने का कार्य आरंभ होने वाला था।
समुद्र तट पर तैयारी
रामेश्वरम के तट पर वानर सेना का कोलाहल गूंज रहा था। हर वानर अपने प्रभु राम के कार्य में सहायता करने के लिए उत्सुक था। कुछ विशाल शिलाएं ढो रहे थे, तो कुछ पेड़ उखाड़कर ला रहे थे। तट पर चारों ओर उत्साह और भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई दे रहा था। राम जी शांत भाव से खड़े होकर संपूर्ण प्रक्रिया का निरीक्षण कर रहे थे। उनकी आँखों में लंका विजय का संकल्प स्पष्ट झलक रहा था।
जामवंत ने वानरों को उत्साहित करते हुए कहा, "हे वानरों! यह साधारण पत्थर नहीं, राम नाम की शक्ति से अभिमंत्रित शिलाएं हैं। प्रत्येक शिला लंका की ओर एक कदम है। पूरी शक्ति से कार्य करो, प्रभु राम की कृपा हम पर सदैव बनी रहेगी।"
नल और नील की अद्भुत क्षमता
सेतु निर्माण का कार्य नल और नील नामक दो वानर भाइयों के निरीक्षण में हो रहा था। उन्हें यह अद्भुत क्षमता प्राप्त थी कि उनके द्वारा स्पर्श की गई कोई भी वस्तु पानी में नहीं डूबती थी। यह वरदान उन्हें बचपन में एक ऋषि से मिला था। नल और नील कुशलता से पत्थरों को जोड़ रहे थे, और वानर सेना 'जय श्री राम' का उद्घोष कर रही थी। हर पत्थर पर राम नाम लिखा जा रहा था, जिससे वह भारहीन होकर समुद्र में तैरने लगा।
जैसे ही नल और नील ने पहली शिला समुद्र में डाली, राम जी ने हाथ जोड़कर समुद्र देव से प्रार्थना की, "हे सागर देव! कृपया हमें मार्ग प्रदान करें। यह सेतु धर्म की स्थापना के लिए बनाया जा रहा है।" समुद्र शांत रहा, परन्तु राम जी का संकल्प दृढ़ था। उनकी भक्ति और दृढ़ निश्चय देखकर समुद्र देव प्रकट हुए और उन्होंने सेतु निर्माण में बाधा न डालने का आश्वासन दिया।
लंका प्रस्थान की तैयारी
कुछ ही दिनों में वानर सेना ने सौ योजन लंबा सेतु बांध दिया। सेतु बनते ही वानरों में उत्साह की लहर दौड़ गई। अब लंका दूर नहीं थी। राम जी ने लक्ष्मण जी को और हनुमान जी को साथ लेकर सेतु पर कदम रखा। वानर सेना 'जय श्री राम' के जयघोष से आकाश गुंजायमान कर रही थी। लंका की ओर यह यात्रा धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक थी।
राम जी ने हनुमान से कहा, "हनुमान, अब रावण के अंत का समय निकट है। सीता माता को मुक्त कराकर हम अयोध्या लौटेंगे। धर्म की स्थापना होगी और रावण का अहंकार चूर-चूर हो जाएगा"। हनुमान जी ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और बोले, "प्रभु, आपकी सेवा में मैं अपना सर्वस्व अर्पण करने को तैयार हूँ।"
अध्याय 7 का सार: इस अध्याय में रामेश्वरम में सेतु बंध का निर्माण होता है, जिसमें नल और नील की विशेष भूमिका है। भगवान राम की भक्ति और समुद्र देव की कृपा से यह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होता है, जिससे वानर सेना लंका की ओर प्रस्थान करती है। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि दृढ़ संकल्प और ईश्वर की भक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
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