देवी की कथाएँ

सती कथा – अध्याय 3: सती और शिव का विवाह

Tilak Kathayein12 Apr 2026151 views📖 1 min read
सती कथा
सती कथा का अध्याय 3 — सती और शिव का विवाह। सती और शिव का विवाह होता है, लेकिन दक्ष इस विवाह से प्रसन्न नहीं हैं और शिव का अपमान करते हैं।

सती और शिव का विवाह

सती का कठोर तप रंग लाया। भगवान शिव, सती की भक्ति और प्रेम से द्रवित होकर अंततः उन्हें दर्शन देने के लिए कैलाश पर्वत से नीचे उतरे। वह दृश्य अद्भुत था, मानो प्रकृति स्वयं सती के संकल्प की साक्षी बनने के लिए आतुर हो रही हो। अब आगे की कथा विवाह और उसके परिणाम की है।

विवाह की तैयारी

जैसे ही शिव ने सती के सामने प्रकट होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, सती की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उनकी आँखों में प्रेम और कृतज्ञता के आंसू छलक आए। शिव का तेज ऐसा था, मानो करोड़ों सूर्य एक साथ चमक रहे हों, पर सती के हृदय में उनके प्रति प्रेम का भाव ही प्रमुख था। हिमालय राजा ने जब यह शुभ समाचार सुना तो उनकी ख़ुशी का वर्णन करना कठिन है। उन्होंने तुरंत विवाह की तैयारी शुरू कर दी। पूरे हिमालय पर्वत को फूलों और रंगबिरंगी पताकाओं से सजाया गया।

"हे महादेव," सती ने प्रेमपूर्वक कहा, "मेरा जीवन तभी सार्थक होगा जब मैं आपकी अर्धांगिनी बनूंगी। मेरा तप केवल आपको पाने के लिए था।" शिव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "देवी, तुम्हारा प्रेम ही मेरा बंधन है। मैं तुम्हें अपनी शक्ति और अपने हृदय में सदैव स्थान दूंगा।"

सती और शिव का मिलन

शुभ मुहूर्त पर, सती और शिव का विवाह संपन्न हुआ। देवता, गंधर्व, किन्नर, और ऋषि-मुनि इस अलौकिक विवाह को देखने के लिए एकत्रित हुए। ब्रह्मा जी ने विवाह की रस्मों को संपन्न कराया और विष्णु जी ने सती का कन्यादान किया। कैलाश पर्वत से आई बारात में भूत-प्रेत, गण, और नंदी बैल भी शामिल थे, जो शिव के अनोखे स्वरूप को दर्शा रहे थे। विवाह के बाद, सती कैलाश पर्वत पर शिव के साथ रहने लगीं। कैलाश का वातावरण सती के आगमन से और भी दिव्य हो गया।

सती, माँ भगवती का ही रूप थीं, इसलिए उनके विवाह से समस्त लोकों को आनंद और समृद्धि की प्राप्ति हुई। उनकी कृपा से प्रकृति में संतुलन बना रहा और सभी प्राणियों को शांति मिली। शिव और सती का मिलन प्रेम और शक्ति का प्रतीक था।

दक्ष का क्रोध

हालांकि सभी देवता शिव और सती के विवाह से प्रसन्न थे, लेकिन सती के पिता, दक्ष प्रजापति, इस विवाह से अप्रसन्न थे। दक्ष, शिव को एक विरक्त और योगी मानते थे, जो राजसी ठाट-बाट से दूर रहते हैं। उन्हें यह पसंद नहीं था कि उनकी पुत्री एक ऐसे व्यक्ति से विवाह करे जो संसारिक सुखों से विरक्त है। दक्ष ने शिव का अपमान करना शुरू कर दिया। वे उन्हें हमेशा कटु वचन बोलते और उनका तिरस्कार करते रहते थे। दक्ष का अहंकार बढ़ता गया और उन्होंने शिव को नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास किया। यह अपमान सती के लिए असहनीय था, क्योंकि वे अपने पिता का सम्मान करती थीं, लेकिन अपने पति के अपमान को सहन नहीं कर सकती थीं। यह तिरस्कार आगे चलकर एक बड़ी घटना का कारण बना।

अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में सती और शिव के विवाह का वर्णन है। सती का तप सफल होता है और भगवान शिव उनसे विवाह करते हैं। हालांकि, सती के पिता दक्ष प्रजापति इस विवाह से अप्रसन्न होते हैं और शिव का तिरस्कार करते हैं, जो आगे की घटनाओं का कारण बनता है। यह दर्शाता है कि अहंकार और अनादर विनाशकारी हो सकते हैं, जबकि प्रेम और भक्ति कल्याणकारी होते हैं।

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आज का पंचांग 29 अगस्त 2026

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