सती कथा – अध्याय 5: सती का आत्मदाह

सती का आत्मदाह
दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सुनकर सती के हृदय में क्रोध की ज्वाला धधक उठी। अपने पति का ऐसा तिरस्कार, वह भी उनके अपने पिता के द्वारा, सती के लिए असहनीय था। वह जानती थीं कि इस अपमान का बदला लेना होगा, पर किस प्रकार?
शिव के अपमान से क्रोध
सती का मन ज्वाला की भांति धधक रहा था। दक्ष के यज्ञ में शिव को निमंत्रण न देना और फिर सार्वजनिक रूप से उनका उपहास करना, यह उनके पति का ही नहीं, स्वयं सती का भी अपमान था। उनकी आंखों में अग्नि सी चमक रही थी, वाणी कांप रही थी। उन्होंने अपने मन में निश्चय किया कि इस अपमान का प्रतिकार अवश्य होगा। देवताओं और ऋषियों के बीच होते यज्ञ को उन्होंने तिरस्कार की दृष्टी से देखा, जैसे वह यज्ञ नहीं बल्कि अधर्म का केंद्र हो। उनकी आत्मा भगवान शिव के प्रति प्रेम और अपने पिता के प्रति क्रोध से विभाजित हो रही थी।
सती ने अपने आप से कहा, "यह कैसा यज्ञ है, जिसमे मेरे स्वामी, मेरे जीवन, मेरे आराध्य देव का कोई स्थान नहीं? क्या मेरे पिता अंधे हो गए हैं? क्या वे नहीं जानते कि शिव ही सत्य हैं, शिव ही सनातन हैं?"
दक्ष से अंतिम विवाद
क्रोधित सती यज्ञशाला में अपने पिता दक्ष के पास पहुंचीं। तेज स्वर में उन्होंने कहा, "पिताश्री! आपने यह क्या किया? आपने अपने दामाद और मेरे पति, भगवान शिव का अपमान किया है। क्या आप भूल गए हैं कि वे त्रिलोकीनाथ हैं, सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं? आपने मुझे इस यज्ञ में बुलाकर भी मेरा तिरस्कार किया है। क्या पुत्री को पिता के घर आने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता होती है? मुझे धिक्कार है कि मेरा जन्म आपके घर में हुआ।" सती के शब्द यज्ञशाला में गूंज रहे थे, और उपस्थित सभी देवता और ऋषि स्तब्ध थे। दक्ष ने अहंकार से उत्तर दिया, "तुम एक पागल जोगी के पीछे भाग गई हो, इसलिए तुम्हें यह सब सहन करना होगा। शिव एक अघोरी हैं, उनका इस यज्ञ में कोई स्थान नहीं है।"
सती ने गहरी साँस ली और कहा, "पिताजी, आपने भगवान शिव का अपमान करके केवल मेरा ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड का अपमान किया है। आपको इसका परिणाम अवश्य भुगतना होगा।" सती ने अपने पिता की ओर करुणा भरी दृष्टि से देखा, क्योंकि वह जानती थी कि दक्ष के अहंकार ने उसकी बुद्धि हर ली है। उनके वाक्यों में क्रोध के साथ दुःख भी था, अपने पिता के पतन का दुःख।
सती का आत्मदाह
सती ने अपने पिता को अंतिम बार देखा और फिर अपने चारों ओर एक तेज अग्नि उत्पन्न की। "यदि मैं तुम्हारी पुत्री हूँ," उन्होंने घोषणा की, “तो मैं अब इस शरीर को नहीं रख सकती जो तुमने मुझे दिया है। मैं इस शरीर को इस तुच्छ जीवन को त्यागती हूँ।" यह कहते हुए सती ने स्वयं को यज्ञ कुंड में समर्पित कर दिया। अग्नि की लपटें आकाश तक पहुंचीं, और सती का पार्थिव शरीर भस्म हो गया। देवताओं और ऋषियों में हाहाकार मच गया। दक्ष अपने कर्मों पर पछताने के लिए भी जीवित नहीं बच पाए।
सती का यह बलिदान प्रेम, भक्ति और सत्य की विजय का प्रतीक था। उन्होंने अपने आत्मदाह से यह सिद्ध कर दिया कि पति का अपमान सहन करना पत्नी के लिए मृत्यु से भी बढ़कर है। इस बलिदान ने आगे चलकर एक नए युग की शुरुआत की, जहां बुराई पर अच्छाई की विजय निश्चित थी। सती ने अपने प्राण त्याग कर भगवान शिव की महिमा को ब्रह्माण्ड में स्थापित कर दिया।
शिव का क्रोध और विनाश का आरंभ
जैसे ही यह दारुण समाचार भगवान शिव तक पहुंचा, उनके तीसरे नेत्र से क्रोध की ज्वाला निकली। वह क्रोध इतना प्रचंड था कि उसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड को कंपा दिया। शिव ने अपने जटा से वीरभद्र को उत्पन्न किया, जो दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने और उसे दंडित करने के लिए तत्पर था। सती के आत्मदाह ने भगवान शिव के विनाशकारी रूप को जगा दिया था, जिसके बाद प्रलय अवश्यंभावी थी। अब दक्ष का विनाश और शिव का क्रोध सम्पूर्ण विश्व को हिला देगा, जिसकी शुरुआत होगी अगले अध्याय में।
अध्याय 5 का सार: सती, अपने पति शिव के अपमान से क्रोधित होकर, अपने पिता दक्ष के यज्ञ में जाती हैं और उनसे विवाद करती हैं। अपने पति के तिरस्कार को सहन न कर पाने के कारण, वह यज्ञ कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लेती हैं। यह घटना दिखाती है कि सच्चा प्रेम और भक्ति किसी भी अपमान से ऊपर होते हैं, और धार्मिक कर्मों का महत्व तभी है जब उनमें प्रेम और सम्मान हो।
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