राधा कथा – अध्याय 4: कृष्ण का मथुरा प्रस्थान

कृष्ण का मथुरा प्रस्थान
पिछले अध्याय, "दिव्य प्रेम का उदय" में हमने राधा और कृष्ण के अटूट प्रेम बंधन को देखा। वृन्दावन की गलियों में उनकी रासलीला, यमुना तट पर प्रेम वार्तालाप, और गोपियों संग उनका आनंदमय जीवन एक दिव्य अनुभूति थी। पर काल की गति अटूट है, और समय परिवर्तन का संदेश लेकर आया। अब, कृष्ण के जीवन में एक नया अध्याय लिखने का समय आ गया था - मथुरा प्रस्थान का अध्याय, जो राधा के हृदय में विरह की अग्नि प्रज्वलित करने वाला था।
अक्रूर का आगमन
वृन्दावन में शांति और प्रेम का वातावरण छाया हुआ था। यमुना नदी शांत भाव से बह रही थी, मानो कृष्ण के अगले पड़ाव को जानती हो। तभी, एक रथ वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करता है। रथ पर सवार थे अक्रूर, कंस के विश्वसनीय सेवक, जिनका मुख चिंता की रेखाओं से भरा हुआ था। अक्रूर सीधे नंद बाबा के घर पहुंचे, जहाँ कृष्ण अपने सखाओं के साथ खेल रहे थे। अक्रूर को देखते ही नंद बाबा ने सत्कार से स्वागत किया, पर उनके मन में एक अनजानी आशंका ने जन्म ले लिया था।
अक्रूर ने हाथ जोड़कर कहा, "नंद बाबा, मैं कंस महाराज का संदेश लेकर आया हूँ। उन्होंने कृष्ण और बलराम को मथुरा आमंत्रित किया है, वहाँ एक विशाल धनुष यज्ञ का आयोजन किया गया है। कंस चाहते हैं कि कृष्ण और बलराम अपनी शक्ति का प्रदर्शन करें और उन्हें सम्मानित करें।" कृष्ण ने अक्रूर की ओर देखा, उनके नेत्रों में एक गंभीर चमक थी। वह जानते थे कि यह मात्र एक धनुष यज्ञ का निमंत्रण नहीं है; यह उनके जीवन के एक नए पथ की शुरुआत है, एक ऐसा पथ जो उन्हें राधा से दूर ले जाएगा। कृष्ण ने अपने मन में दृढ़ निश्चय किया, "मथुरा जाना होगा, धर्म की स्थापना करनी होगी।"
राधा का विरह
जैसे ही कृष्ण ने मथुरा जाने का निर्णय लिया, यह समाचार पूरे वृन्दावन में आग की तरह फैल गया। गोपियाँ व्याकुल हो उठीं, उनका आनंद शोक में बदल गया। पर सबसे गहरी वेदना तो राधा के हृदय में थी। उनके प्राणों के आधार, उनके जीवन के सर्वस्व, उनसे दूर जा रहे थे। राधा दौड़ी-दौड़ी कृष्ण के पास पहुँची, उनके नेत्रों में अश्रु की धारा बह रही थी। राधा ने कृष्ण का हाथ पकड़कर कहा, "कान्हा, तुम मुझे छोड़कर कैसे जा सकते हो? तुम्हारे बिना मेरा जीवन सूना हो जाएगा। मेरे वृन्दावन का क्या होगा?"
राधा की व्याकुलता देखकर कृष्ण का हृदय भी पीड़ा से भर गया। उन्होंने राधा के अश्रु पोंछे और कहा, "राधे, मैं जानता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं है, पर मुझे धर्म के मार्ग पर चलना होगा। कंस के अत्याचारों का अंत करना होगा। यह मेरा कर्तव्य है। तुम तो जानती हो कि तुम मेरे हृदय में सदैव विराजमान रहोगी। यह दूरी केवल शारीरिक है, आत्मिक रूप से हम सदैव एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे।" कृष्ण ने राधा को समझाया कि राधा तो स्वयं शक्ति स्वरूपा है, वह इस विरह को सहने और संसार को प्रेम का मार्ग दिखाने में सक्षम है।
विदाई की बेला
प्रस्थान का दिन आ गया। पूरा वृन्दावन शोक में डूबा हुआ था। गोपियाँ यमुना तट पर इकट्ठी हो गई थीं, उनकी आँखों में आँसू थे और हृदय में विरह की अग्नि। कृष्ण और बलराम रथ पर सवार हुए। राधा, अपनी सखियों के साथ, रथ के पीछे-पीछे चल रही थीं। उनकी चाल धीमी हो रही थी, मानो उनके पैर आगे बढ़ने को तैयार ही न हों। कृष्ण ने रथ रुकवाया और राधा की ओर देखा। उनके नेत्रों में प्रेम, करुणा और आश्वासन था।
कृष्ण ने राधा को आश्वस्त किया कि उनका प्रेम शाश्वत है, यह दूरी उनके प्रेम को और भी गहरा करेगी। राधा ने कृष्ण को तिलक लगाया और आरती उतारी। यह विदाई केवल शारीरिक विदाई नहीं थी, यह एक युग की विदाई थी, एक दिव्य प्रेम कथा का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। राधा ने अपने मन को समझाया कि कृष्ण का जाना धर्म की स्थापना के लिए आवश्यक है, और उनका प्रेम सदैव उनके हृदय में सुरक्षित रहेगा। जैसे ही रथ मथुरा की ओर बढ़ा, राधा मूर्छित होकर गिर पड़ीं। उनकी सखियों ने उन्हें संभाला, पर उनके हृदय में कृष्ण के विरह की अग्नि धधकती रही। इस विरह ने राधा को और भी अधिक दिव्य बना दिया, उन्हें प्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति बना दिया।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने कृष्ण के मथुरा प्रस्थान और राधा के विरह को देखा। कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए मथुरा जाते हैं, जबकि राधा उनके विरह में व्याकुल हो जाती हैं। यह अध्याय हमें सिखाता है कि प्रेम में त्याग और कर्तव्य का पालन करना भी आवश्यक है, और सच्चा प्रेम कभी भी दूरियों से कम नहीं होता।
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