समुद्र मंथन कथा – अध्याय 5: विष हलाहल का उदय

विष हलाहल का उदय
पिछले अध्याय में, हमने देखा कि किस प्रकार देवता और असुर समुद्र मंथन करने के लिए एकत्रित हुए, मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। दोनों पक्षों में उत्साह था, अमृत पाने की लालसा थी, पर किसी को भी यह नहीं पता था कि समुद्र की गहराई में क्या छुपा है। मंथन के संकल्प के साथ ही, एक ऐसी विपदा आने वाली थी, जिसका सामना करना देवताओं के लिए भी असम्भव था।
कालकूट का प्रकटीकरण
समुद्र मंथन का कार्य प्रारंभ हुआ। मंदराचल पर्वत घूमने लगा, वासुकि नाग की भयंकर गर्जना गूंजने लगी, और समुद्र में हलचल मच गई। जैसे-जैसे मंथन तीव्र होता गया, समुद्र की गहराई से अनेक अद्भुत वस्तुएँ प्रकट होने लगीं। लेकिन तभी, एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ, जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया। एक काला धुआं, कालकूट विष, समुद्र से उठने लगा। उसकी भीषण गंध से दिशाएँ भर गईं, और सांस लेना भी मुश्किल हो गया। देवताओं और असुरों दोनों के चेहरे भय से पीले पड़ गए।
देवराज इंद्र त्राहिमाम पुकार उठे, "यह क्या है! यह तो हलाहल विष है! इसकी ज्वाला हमें भस्म कर देगी!" असुर भी भयभीत हो गए, अपने हाथों से मुंह ढक लिया। "यह मंथन तो विनाश का कारण बन जाएगा। अमृत तो दूर, हम सभी मृत्यु के ग्रास बन जाएंगे!" एक असुर चिल्लाया। इस विष की प्रचंड शक्ति ने देवताओं और असुरों दोनों को असहाय कर दिया।
विष्णु का आश्वासन
हलाहल की ज्वाला त्राहिमाम मचा रही थी। देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में दौड़े। उन्होंने विष्णु को प्रणाम किया और उनसे प्रार्थना की, "हे भगवान, यह हलाहल विष पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर देगा। कृपया हमारी रक्षा करें!" भगवान विष्णु ने शांत भाव से देवताओं को देखा। उन्होंने कहा, "हे देवताओं, डरो मत। यह विपत्ति अवश्य ही भयंकर है, परंतु इसका समाधान भी है। केवल महादेव ही इस विष को पीकर ब्रह्मांड को बचा सकते हैं। तुम सब मिलकर भगवान शिव की स्तुति करो।"
विष्णु की आज्ञा पाकर, सभी देवता और असुर भगवान शिव की स्तुति करने लगे। उन्होंने मिलकर प्रार्थना की, "हे आदिदेव महादेव, आप ही इस ब्रह्मांड के रक्षक हैं। इस विष से हमें बचाइए, हे नीलकंठ!" विष्णु अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उनकी कृपा से देवताओं के ह्रदय में आशा का संचार हुआ।
शिव का विषपान
देवताओं की स्तुति सुनकर, भगवान शिव कैलाश पर्वत से प्रकट हुए। उन्होंने देखा कि हलाहल विष पूरे ब्रह्मांड को अपनी चपेट में ले रहा है। दया से द्रवित होकर, भगवान शिव ने कहा, "यह विष पूरी सृष्टि को नष्ट कर देगा। मैं इसे पीकर ब्रह्मांड की रक्षा करूंगा।" यह कहते हुए, भगवान शिव ने हलाहल विष को अपनी अंजली में लिया और उसे पी गए। विष उनके कंठ में जाकर स्थिर हो गया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया। तभी से वे नीलकंठ कहलाए।
जब माता पार्वती ने देखा कि शिव ने विष का पान कर लिया है, तो वे व्याकुल हो गईं। उन्होंने अपने हाथों से शिव का कंठ दबाया, जिससे विष उनके शरीर में न फैल सके। इस कारण विष शिव के कंठ में ही रह गया और उन्होंने पूरे संसार को बचा लिया। देवताओं और असुरों ने भगवान शिव की जय-जयकार की। उनके त्याग और बलिदान से सभी कृतज्ञ हो गए। शिव ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना, संसार को विनाश से बचाया था। अब, हलाहल का संकट टल गया था, और समुद्र मंथन फिर से शुरू हो सकता था। परंतु, शिव के इस बलिदान ने एक नई चुनौती उत्पन्न कर दी थी, जिसका सामना करना अभी बाकी था।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हलाहल विष का उदय हुआ, जिससे देवता और असुर भयभीत हो गए। भगवान शिव ने विषपान कर ब्रह्मांड की रक्षा की। इस अध्याय का आध्यात्मिक संदेश यह है कि त्याग और बलिदान से ही संसार को बचाया जा सकता है।
आज का पंचांग 1 अगस्त 2026
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