समुद्र मंथन कथा – अध्याय 6: शिव का बलिदान | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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समुद्र मंथन कथा – अध्याय 6: शिव का बलिदान

Tilak Kathayein12 Apr 202691 views📖 1 min read
समुद्र मंथन कथा
समुद्र मंथन कथा का अध्याय 6 — शिव का बलिदान। भगवान शिव हलाहल विष को पीकर ब्रह्मांड को बचाते हैं और नीलकंठ बनते हैं।

शिव का बलिदान

समुद्र मंथन की प्रक्रिया में जैसे ही हलाहल विष का उदय हुआ, तीनो लोकों में हाहाकार मच गया। देवता और असुर दोनों ही उस विष की भीषण गर्मी और विनाशकारी शक्ति से भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। समस्त सृष्टि पर महाविनाश का खतरा मंडराने लगा था, और उस संकट से बचाने के लिए केवल एक ही आशा की किरण थी - भगवान शिव!

विष की ज्वाला

हलाहल विष की ज्वाला इतनी प्रचंड थी कि सूर्य की किरणें भी मंद पड़ गईं, वायुमंडल में विषैली गैस फैल गई, और पृथ्वी जलने लगी। देवता, असुर, गंधर्व, नाग, और मनुष्य, सभी उस विष के प्रभाव से त्रस्त थे। हर तरफ चीत्कार और कराहने की आवाज़ें गूंज रही थीं। भय और निराशा का वातावरण छा गया था। प्राणियों को लग रहा था मानो प्रलय आ गया हो। कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव ने अपनी दिव्य दृष्टि से इस महाविनाश को देखा, उनके मन में करुणा उमड़ पड़ी।

भगवान शिव ने मन ही मन सोचा, "यदि मैंने इस विष को नहीं रोका, तो यह पूरी सृष्टि को भस्म कर देगा। मेरे भक्त त्राहिमाम त्राहिमाम पुकार रहे हैं। मैं अपने भक्तों को इस संकट से कैसे बचाऊं?" उन्होंने अपने त्रिशूल को उठाया और एक गहरा श्वास लिया, जानते हुए कि आगे क्या करना है।

शिव का विषपान

दया से भरे हृदय के साथ, भगवान शिव ने विष को पीने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी योगमाया से विष को एकत्रित किया और उसे अपनी अंजुली में धारण कर लिया। सभी देवता और असुर अचंभित होकर देख रहे थे, किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई इस विष को पीने का साहस कर सकता है। भगवान शिव ने "ॐ नमः शिवाय" का जाप किया और विष को पी गए। विष उनके कंठ तक पहुँचते ही तीव्र जलन हुई, लेकिन उन्होंने अपने मन को स्थिर रखा और विष को नीचे उतरने नहीं दिया।

जैसे ही भगवान शिव ने विष का पान किया, विष्णु की माया से एक अदृश्य शक्ति ने विष के प्रभाव को कम करना शुरू कर दिया। यह विष्णु की कृपा ही थी कि शिव का शरीर विष के कारण पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ। उनके कंठ में विष का गहरा नीला निशान पड़ गया, जिसके कारण वे नीलकंठ कहलाए।

पार्वती की प्रार्थना

जब माता पार्वती को पता चला कि भगवान शिव ने हलाहल विष का पान कर लिया है, तो वे व्याकुल हो गईं। उन्होंने तुरंत भगवान शिव के पास पहुँचकर उनके कंठ को अपने हाथों से पकड़ लिया, ताकि विष उनके शरीर में और नीचे न उतरे। पार्वती ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे अपने प्राणों की रक्षा करें। शिव, अपनी पत्नी के प्रेम और प्रार्थना से अभिभूत हो गए। उन्होंने अपने योगबल से विष को अपने कंठ में ही रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। यह बलिदान, यह त्याग, युगों युगों तक याद किया जाएगा। अब आगे देवताओं और असुरों को अमृत की प्राप्ति होगी, और इस समुद्र मंथन से कई रत्न प्रकट होंगे, जिनका वर्णन अगले अध्याय में किया जाएगा।

अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में, हमने देखा कि कैसे भगवान शिव ने हलाहल विष का पान करके सृष्टि की रक्षा की। उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना, समस्त प्राणियों पर दया दिखाई और स्वयं को नीलकंठ बना लिया। यह घटना हमें निःस्वार्थ प्रेम, त्याग, और करुणा का महत्व सिखाती है।

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