समुद्र मंथन कथा – अध्याय 3: असुरों से गठबंधन

असुरों से गठबंधन
पिछले अध्याय में भगवान विष्णु से सहायता का आश्वासन पाकर देवतागण उत्साहित थे। दैत्यों की अपार शक्ति को परास्त करने का एकमात्र उपाय यही था कि दोनों पक्ष मिलकर समुद्र मंथन करें और अमृत प्राप्त करें। अब देवताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी असुरों को इस कठिन कार्य में सम्मिलित होने के लिए राज़ी करना। देवताओं को पता था कि यह कार्य आसान नहीं होगा, परन्तु भगवान विष्णु की कृपा पर उन्हें पूर्ण विश्वास था।
विष्णु की सलाह
इंद्र देवताओं के राजा, चिंतित मुद्रा में बैठे थे। उनका मन आशंकाओं से घिरा हुआ था। स्वर्गलोक की आभा मंद लग रही थी क्योंकि असुरों का भय हर हृदय में व्याप्त था। चिंतित देवताओं को देख कर बृहस्पति देव ने कहा, "देवराज, भगवान विष्णु ने जो मार्ग दिखाया है, वह अवश्य ही सफल होगा। हमें उनकी योजना पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।" बृहस्पति देव के शब्दों में देवताओं के लिए आशा की किरण थी।
इंद्र ने उत्तर दिया, "गुरुदेव, मैं जानता हूँ कि भगवान विष्णु की योजना निष्फल नहीं हो सकती, परन्तु असुरों को मनाना अत्यंत कठिन है। वे स्वभाव से ही क्रूर और लालची हैं। उन्हें कैसे विश्वास दिलाया जाए कि इस मंथन से निकलने वाला अमृत सभी के लिए होगा?" उनके मन में यह आशंका थी कि कहीं असुर अमृत पर अकेले ही कब्ज़ा न कर लें।
असुरों के साथ समझौता
देवतागण असुरराज बलि के दरबार में पहुंचे। देवताओं को देखकर असुर सैनिक क्रोधित हो उठे, लेकिन बलि ने उन्हें शांत रहने का संकेत दिया। इंद्र ने विनम्रतापूर्वक बलि को प्रणाम किया और कहा, "हे असुरराज, हम आपके पास एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव लेकर आए हैं। भगवान विष्णु की प्रेरणा से हम सभी मिलकर समुद्र मंथन करना चाहते हैं, ताकि अमृत प्राप्त हो सके और यह अमृत दोनों पक्षों में समान रूप से वितरित किया जायेगा।" बलि ने इंद्र के प्रस्ताव को ध्यान से सुना, उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी, यह लालच की चमक थी।
बलि ने कुछ क्षण विचार किया और फिर कहा, "देवराज, तुम्हारा प्रस्ताव आकर्षक तो है, लेकिन हम असुर बिना कुछ पाए परिश्रम करने के आदी नहीं हैं। यदि हम इस मंथन में सहायता करते हैं, तो हमें क्या मिलेगा? हमें इस बात का क्या प्रमाण है कि अमृत दोनों पक्षों में समान रूप से बांटा जाएगा?" बलि के मन में अमरता का लालच जाग उठा था। विष्णु की कृपा से देवताओं में धैर्य बना रहा।
इंद्र ने कहा, "असुरराज, हम आपको वचन देते हैं कि अमृत समान रूप से बांटा जाएगा। हमारी ओर से कोई छल नहीं होगा। स्वयं भगवान विष्णु इस मंथन की निगरानी करेंगे।" इंद्र ने यह भी कहा कि इस मंथन से केवल अमृत ही नहीं, बल्कि अन्य बहुमूल्य रत्न भी प्राप्त होंगे, जो दोनों पक्षों में बराबर बांटे जाएंगे। देवताओं ने असुरों को प्रलोभन दिया, उन्हें स्वर्ण, मणि और स्वर्ग के सुखों के बारे में बताया ताकि वे मंथन के लिए तैयार हो जाएं। विष्णु की माया से असुरगण इस लालच में फंस गए।
अमरता का लालच
असुर बलि और उसके साथी अमरता के लालच में अंधे हो गए। उन्होंने सोचा कि देवताओं के साथ मिलकर मंथन करने से उन्हें भी अमरता प्राप्त हो जाएगी और वे हमेशा के लिए शक्तिशाली बन जाएंगे। उन्हें देवताओं पर विश्वास नहीं था, लेकिन अमृत की चाहत ने उन्हें अंधा बना दिया था। उन्होंने मंथन में शामिल होने के लिए सहमति दे दी। इस प्रकार, देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन के लिए एक अस्थायी गठबंधन हो गया।
विष्णु जानते थे कि असुर स्वभाव से कपटी हैं, परन्तु उन्हें यह भी ज्ञात था कि अमृत प्राप्त करने के लिए उन्हें असुरों की शक्ति की आवश्यकता होगी। उन्होंने देवताओं को धैर्य रखने और हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया। भगवान विष्णु की लीला अपरम्पार है, वे जानते थे कि आगे क्या होने वाला है, और उनकी योजना के अनुसार ही सब कुछ घटित हो रहा था। देवताओं ने भी भगवान विष्णु के चरणों में प्रार्थना की, उनसे शक्ति और बुद्धि मांगी ताकि वे इस कठिन कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कर सकें।
मंथन की तैयारी
देवताओं और असुरों के बीच गठबंधन तो हो गया था, लेकिन अब मंथन की तैयारी का कार्य शेष था। मंदराचल पर्वत को उखाड़ना और उसे क्षीरसागर में ले जाना, वासुकि नाग को रस्सी के रूप में प्रयोग करना, ये सब कार्य अत्यंत कठिन थे। देवताओं और असुरों दोनों को अपनी पूरी शक्ति लगानी थी। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे दोनों पक्ष मिलकर मंथन की तैयारी करते हैं और क्या-क्या कठिनाइयां उनके मार्ग में आती हैं।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में देवताओं ने भगवान विष्णु की सलाह पर असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का निश्चय किया। अमरता के लालच में असुर भी इस कार्य में सम्मिलित होने के लिए राज़ी हो गए। इस अध्याय से यह सीख मिलती है कि कभी-कभी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें विपरीत स्वभाव वाले लोगों के साथ भी मिलकर काम करना पड़ता है, परन्तु सदैव विवेक और धैर्य बनाए रखना चाहिए।
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