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शुक्राचार्य कथा – अध्याय 5: ययाति का श्राप और उद्धार

Tilak Kathayein12 Apr 2026132 views📖 1 min read
शुक्राचार्य कथा
शुक्राचार्य कथा का अध्याय 5 — ययाति का श्राप और उद्धार। शुक्राचार्य द्वारा राजा ययाति को दिया गया श्राप और बाद में ययाति के पुण्य कर्मों से श्राप का निवारण का वर्णन है।

ययाति का श्राप और उद्धार

देवयानी और कच की प्रेम कहानी का विधिवत अंत होने के बाद, देवयानी का मन दुख से भर गया था। वह जानती थी कि कच नियति के मार्ग पर लौट गया है। इसी बीच, राजा ययाति, जो अपने शौर्य और न्यायप्रियता के लिए विख्यात थे, एक दिन वन में शिकार करते हुए देवयानी के आश्रम में पहुंचे।

ययाति का मोह

वन की शांत हरियाली में, देवयानी एक शिला पर बैठी हुई अपनी नियति के बारे में सोच रही थी। उसकी सुंदरता ऐसी थी, मानो स्वयं अप्सरा धरती पर उतर आई हो। ययाति, जो अपनी युवावस्था के सौंदर्य से परिपूर्ण थे, देवयानी को देखते ही मोहित हो गए। उनकी आँखों में एक अनजान आकर्षण उमड़ पड़ा, और उनका हृदय प्रेम से भर गया। ययाति ने अपने धनुष को संभाला और विनम्रता से देवयानी के पास जाकर अपना परिचय दिया।

"देवी, मैं राजा ययाति हूँ, और मेरे भाग्य ने आज मुझे आपके दर्शन कराए हैं। आपका सौंदर्य सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी है। क्या मैं जान सकता हूँ कि आप कौन हैं और इस वन में अकेली क्या कर रही हैं?" ययाति ने देवयानी के नेत्रों में देखते हुए कहा। देवयानी ने राजा की ओर देखा और अपनी पहचान बताते हुए अपनी मनोदशा का भी वर्णन किया। उसने कहा, "राजन, मैं शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी हूँ। मेरा मन कच के विरह से व्याकुल है, इसलिए मैं यहाँ एकांत में बैठी हूँ।"

शुक्राचार्य का श्राप

ययाति और देवयानी के बीच प्रेम पनपा और उन्होंने विवाह कर लिया। शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए सहमति तो दे दी, लेकिन उन्होंने ययाति को एक कठोर शर्त दी: "राजन, आप देवयानी से विवाह अवश्य कर सकते हैं, परन्तु आप कभी भी मेरी दासी शर्मिष्ठा के साथ संबंध नहीं बनाएंगे।" ययाति ने शुक्राचार्य की शर्त को स्वीकार कर लिया और उन्होंने आनंदपूर्वक विवाह संपन्न किया। कुछ वर्षों तक, ययाति ने शुक्राचार्य की आज्ञा का पालन किया, लेकिन समय के साथ, वह शर्मिष्ठा के रूप और गुणों पर मोहित हो गए। एक दिन, दुर्बलता के क्षणों में, ययाति ने शर्मिष्ठा के साथ संबंध बना लिए। जब देवयानी को यह पता चला तो वह क्रोध से भर उठी और उसने अपने पिता शुक्राचार्य को सारी बात बताई।

शुक्राचार्य क्रोधित हो उठे और उन्होंने ययाति को तत्काल बूढ़ा होने का श्राप दे दिया। "ययाति, तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है! तुमने मेरे विश्वास को तोड़ा है! तुम्हारी जवानी, जो तुम्हें इतनी प्रिय है, अब तुमसे छीन ली जाएगी। तुम तत्काल वृद्ध हो जाओगे!" शुक्राचार्य ने क्रोध से चिल्लाते हुए कहा। शुक्राचार्य के श्राप के प्रभाव से पल भर में जवानी ढल गयी और ययाति वृद्ध हो गए। उनका शरीर जर्जर हो गया, और उनके चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गईं।

पुत्रों का दान

ययाति अपनी वृद्धावस्था से अत्यंत दुखी थे। उन्हें अपनी युवावस्था की याद आती थी, और वह फिर से युवा बनना चाहते थे। तब उन्हें शुक्राचार्य की बात याद आई कि यदि कोई पुत्र अपनी युवावस्था का दान करे, तो वह फिर से युवा हो सकते हैं। ययाति ने अपने पांच पुत्रों को बुलाया और उनसे अपनी युवावस्था का दान करने के लिए कहा। सबसे पहले, उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से याचना की, लेकिन यदु ने इनकार कर दिया। उसके बाद, उन्होंने एक-एक करके अपने अन्य पुत्रों से भी अनुरोध किया, लेकिन किसी ने भी उनकी बात नहीं मानी, सिवाय सबसे छोटे पुत्र पुरु के। पुरु ने अपने पिता के दुख को समझा और अपनी युवावस्था का दान देने के लिए तैयार हो गया। पुरु का यह बलिदान देखकर ययाति का हृदय कृतज्ञता से भर गया। उन्होंने पुरु को गले लगाया और उसे आशीर्वाद दिया। पुरु की युवावस्था प्राप्त करके ययाति फिर से युवा हो गए और वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया।

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे ययाति ने शुक्राचार्य की शर्त का उल्लंघन किया और श्राप के भागी बने। फिर हमने देखा कि कैसे पुत्र पुरु ने अपने पिता के प्रेम और सम्मान में अपनी युवावस्था का दान दे दिया। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने वचनों का पालन करना चाहिए और अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए। यह दिखाता है कि निःस्वार्थ प्रेम कितना शक्तिशाली हो सकता है। अगले अध्याय में समुद्र मंथन की घटना का वर्णन किया जाएगा, जिसमें देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए संघर्ष होगा।

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आज का पंचांग 29 अगस्त 2026

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