एकादशी व्रत कथा

Pausha Putrada Ekadashi | पौष पुत्रदा एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026

Tilak Kathayein19 May 2026124 views📖 1 min read
पौष पुत्रदा एकादशी – Pausha Putrada Ekadashi
पौष पुत्रदा एकादशी 2026 – व्रत कथा, विधि, क्या खाएं, शुभ मुहूर्त और लाभ। भगवान विष्णु की कृपा पाएं।

पौष पुत्रदा एकादशी – परिचय

पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति और उनकी रक्षा के लिए रखा जाता है। 2026 में, यह एकादशी 1 जनवरी को मनाई जाएगी। इस एकादशी को 'पुत्रदा' इसलिए कहा जाता है क्योंकि 'पुत्र' का अर्थ है संतान और 'दा' का अर्थ है देने वाली। मान्यता है कि इस व्रत के पुण्य से निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है।

सभी एकादशियों में पौष पुत्रदा एकादशी का विशेष स्थान है। इसे सर्वश्रेष्ठ एकादशी माना जाता है क्योंकि यह न केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करती है, बल्कि मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए यह एक अत्यंत शुभ दिन है, जो भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं।

पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा

प्राचीन काल में महिष्मती नामक एक राज्य था, जिसके राजा महीजित थे। राजा को कोई संतान नहीं थी, जिससे वे अत्यंत दुखी रहते थे। उन्होंने अनेक उपाय किए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। एक दिन, वे वन में भटकते हुए एक महात्मा के आश्रम में पहुंचे, जिन्होंने उन्हें पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी।

महात्मा ने बताया कि यह एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसके व्रत के प्रभाव से अवश्य ही संतान की प्राप्ति होगी। राजा महीजित ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से दशमी तिथि से ही संयम का पालन करते हुए एकादशी का व्रत रखा। उन्होंने अन्न का त्याग किया, फलाहार किया और रात्रि जागरण किया। अगले दिन द्वादशी को उन्होंने विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा की और ब्राह्मणों को भोजन कराया।

व्रत के पुण्य प्रभाव से रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। इस प्रकार, राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और राज्य में सुख-समृद्धि लौट आई। इस कथा से यह सिद्ध होता है कि पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा से संतान सुख अवश्य मिलता है।

व्रत विधि

व्रत की तैयारी दशमी तिथि की रात्रि से ही शुरू हो जाती है। दशमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। देर रात तक नहीं जागना चाहिए और जमीन पर सोना चाहिए।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात् भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के समक्ष व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की षोडशोपचार (16 प्रकार की) पूजा करें। पूजा में तुलसी दल, फूल, फल, धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अवश्य अर्पित करें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करते रहें।

समयकरने का कार्य
सूर्योदय से पूर्वनित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नान करें।
सुबहभगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कर पंचोपचार या षोडशोपचार पूजा करें। तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
दिन भरव्रत का पालन करें, फलाहार या अन्न ग्रहण न करें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
शामसंध्या आरती करें और भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें।
रात्रिरात्रि जागरण का विधान है। भगवान विष्णु की कथाएं सुनें या पाठ करें।

द्वादशी तिथि के सूर्योदय से पूर्व व्रत का पारण किया जाता है। पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें। इसके बाद स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत खोलें। यदि द्वादशी तिथि मध्याह्न तक व्याप्त हो तो उसी दिन पारण करना चाहिए, अन्यथा अगले दिन।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

पौष पुत्रदा एकादशी के व्रत में सात्विक आहार का सेवन किया जाता है। इसमें फल, मेवे, दूध, दही, पनीर, कुट्टू का आटा, साबूदाना और सिंघाड़े का आटा शामिल हैं। आप इनका प्रयोग करके हलवा, खिचड़ी या पकौड़े बना सकते हैं। लौकी, कद्दू, गाजर, मूली जैसी सब्जियां भी खाई जा सकती हैं।

इस व्रत में चावल का सेवन पूर्णतया वर्जित है। इसके अतिरिक्त, मसूर की दाल, मूली, बैंगन, लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन भी नहीं करना चाहिए। चावल वर्जित होने का कारण यह माना जाता है कि एकादशी के दिन चावल में कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं, जो खाने योग्य नहीं होते। साथ ही, इन वर्जित वस्तुओं का सेवन करने से व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के लाभ

  • पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश हो जाता है। पद्म पुराण के अनुसार, यह व्रत अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्रदान करता है।
  • मोक्ष प्राप्ति – पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह भगवान विष्णु के धाम में स्थान पाता है।
  • सांसारिक लाभ – यह व्रत संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावी है। इसके साथ ही, यह धन-धान्य, सुख-समृद्धि और दीर्घायु प्रदान करता है।
  • स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया सुधरती है, विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं और शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में पौष पुत्रदा एकादशी कब है?

2026 में पौष पुत्रदा एकादशी 1 जनवरी 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन एकादशी का शुभ मुहूर्त 1 जनवरी की सुबह 08:04 बजे से शुरू होकर 2 जनवरी की सुबह 05:45 बजे तक रहेगा।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित है क्योंकि चावल को भगवान विष्णु का अंश माना जाता है। एक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि मेधातिथि को श्राप मिला था कि वे एकादशी के दिन चावल में रहेंगे। इसलिए, इस दिन चावल खाने से वह पाप लगता है जो किसी की हत्या करने के समान है।

क्या बीमार व्यक्ति पौष पुत्रदा एकादशी व्रत रख सकता है?

बीमार, वृद्ध और गर्भवती महिलाएं यदि पूर्ण उपवास न रख सकें, तो वे फलाहार या जल ग्रहण करके व्रत का पालन कर सकती हैं। वे दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन भी कर सकती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि मन में श्रद्धा और भक्ति बनी रहे।

निष्कर्ष

पौष पुत्रदा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है। भगवान विष्णु अपने भक्तों पर अत्यंत प्रसन्न होते हैं जो इस एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा से रखते हैं। यह व्रत न केवल संतान सुख प्रदान करता है, बल्कि समस्त पापों का नाश कर मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इसे सभी एकादशियों में श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की कामनाओं की पूर्ति करती है।

सभी भक्तों को पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत पूरी आस्था और विश्वास के साथ रखना चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा से निश्चित ही आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!

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आज का पंचांग 25 अगस्त 2026

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