Varuthini Ekadashi | वरूथिनी एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026

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वरूथिनी एकादशी – परिचय
वरूथिनी एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है। वर्ष 2026 में, यह एकादशी 23 मार्च, रविवार को मनाई जाएगी। इस एकादशी को 'वरूथिनी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह 'वरूथिनी' यानी कवच या रक्षा प्रदान करने वाली है। यह एकादशी अपने भक्तों को हर प्रकार के कष्टों और दुखों से बचाती है, जैसे एक सुरक्षा कवच उन्हें सुरक्षित रखता है।
सभी एकादशियों में वरूथिनी एकादशी का विशेष स्थान है और इसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और वह स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है। इसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यकारी भी कहा गया है, इसलिए इसे सर्वश्रेष्ठ एकादशियों में गिना जाता है।
वरूथिनी एकादशी की व्रत कथा
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर एक अत्यंत बलशाली राजा रहते थे, जिनका नाम कुंदनपुर के मंधाता था। एक बार वे वन में तपस्या कर रहे थे, जहाँ एक क्रूर जंगली भालू ने उन पर हमला कर दिया और उनकी बाईं भुजा चबा ली। राजा ने अपनी रक्षा के लिए भालू से युद्ध किया, परंतु वह घायल हो गए और मूर्छित होकर गिर पड़े।
जब राजा को भालू के असहनीय कष्ट का अनुभव हुआ, तो उन्होंने भगवान विष्णु का स्मरण किया और अत्यंत व्याकुल होकर उनसे प्रार्थना की। राजा की पीड़ा सुनकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी माया से एक दिव्य स्त्री का रूप धारण करके भालू को मार डाला। फिर उन्होंने राजा के घावों पर संजीवनी जड़ी-बूटी का लेप लगाया, जिससे राजा पूर्णतः स्वस्थ हो गए।
राजा ने भगवान विष्णु के समक्ष कृतज्ञता व्यक्त की और पूछा कि उन्होंने किस पुण्य कर्म के प्रभाव से ऐसे संकट में भी उनकी रक्षा की। भगवान विष्णु ने बताया कि यह सब उनके पूर्व जन्मों में किए गए वरूथिनी एकादशी व्रत के पुण्य के प्रभाव से हुआ है। राजा ने वरूथिनी एकादशी का विधि-विधान से पालन करने का संकल्प लिया और इस व्रत के पुण्य से उन्हें उत्तम राज्य की प्राप्ति हुई।
व्रत विधि
दशमी की रात को व्यक्ति को सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। देर रात तक जागना वर्जित है और जमीन पर सोना चाहिए।
एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें और व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें, जिसमें उन्हें पुष्प, फल, तुलसी दल और नैवेद्य अर्पित करना शामिल है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या 'ॐ विष्णवे नमः' जैसे मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें।
| समय | करने का कार्य |
|---|---|
| प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) | उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें, दाँत साफ करें। |
| सूर्योदय के पश्चात | घर की साफ-सफाई करें, पूजा स्थल को शुद्ध करें, दीपक प्रज्वलित करें। |
| पूजा का समय | भगवान विष्णु की प्रतिमा का अभिषेक करें, पंचोपचार या षोडशोपचार पूजा करें, तुलसी दल अर्पित करें। |
| दिन भर | व्रत का पालन करें, फलाहार ग्रहण करें (यदि संभव हो), विष्णु सहस्त्रनाम या अन्य विष्णु स्तोत्रों का पाठ करें, मंत्र जाप करें। |
| शाम को | संध्या आरती करें, भगवान विष्णु का ध्यान करें। |
| रात्रि में | फलाहार या सात्विक भोजन (यदि अनुमति हो) ग्रहण करें, रात्रि जागरण का प्रयास करें। |
द्वादशी के दिन, सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें। इसके पश्चात, स्वयं पारण करें। पारण का समय द्वादशी तिथि के सूर्योदय के पश्चात होता है, जब तक द्वादशी तिथि समाप्त न हो जाए। पारण में सात्विक भोजन का सेवन करें, जैसे कि फल, दूध या सामान्य भोजन (जो वर्जित न हो)।
व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं
वरूथिनी एकादशी के व्रत में सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए। इसमें फल (जैसे केला, सेब, अनार), फल-मूल, कंद (जैसे शकरकंद), दूध और दूध से बने पदार्थ (जैसे दही, पनीर), मेवे (जैसे बादाम, काजू, किशमिश) और कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा आदि शामिल हैं। आप साबूदाने की खिचड़ी या खीर भी बना सकते हैं। नमक के रूप में सेंधा नमक का प्रयोग करें।
वरूथिनी एकादशी के व्रत में चावल खाना पूर्णतः वर्जित है। इसके अलावा, किसी भी प्रकार की दाल, अनाज, भूनी हुई चीजें, लहसुन, प्याज, और तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। मांस, मछली और अंडे का सेवन भी वर्जित है। इन वस्तुओं का सेवन करने से व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है। चावल वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि ऐसी मान्यता है कि चावल में जल तत्व की प्रधानता होती है और एकादशी के दिन जल तत्व को महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए चावल का सेवन वर्जित माना जाता है।
वरूथिनी एकादशी व्रत के लाभ
- पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के पिछले जन्मों और वर्तमान जन्म के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। पुराणों के अनुसार, यह व्रत मनुष्य को ब्रह्महत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति दिलाता है।
- मोक्ष प्राप्ति – वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है और वह सीधे वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।
- सांसारिक लाभ – यह व्रत धन, संपत्ति, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है। यह जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करता है और विजय दिलाता है।
- स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया सुधरती है, विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और शरीर को नई ऊर्जा प्राप्त होती है। यह शारीरिक और मानसिक शुद्धि के लिए भी लाभदायक है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2026 में वरूथिनी एकादशी कब है?
2026 में वरूथिनी एकादशी 23 मार्च, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त 22 मार्च की रात 08:05 बजे से शुरू होकर 23 मार्च की शाम 06:02 बजे तक रहेगा।
वरूथिनी एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चावल को जल तत्व का प्रतीक माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस दिन चावल का सेवन करने से भगवान विष्णु अप्रसन्न हो सकते हैं और व्रत का फल नहीं मिलता। कुछ कथाओं के अनुसार, चावल में जल की अधिकता होती है, जो एकादशी के दिन वर्जित मानी जाती है।
क्या बीमार व्यक्ति वरूथिनी एकादशी व्रत रख सकता है?
हाँ, बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं या वृद्धजन भी वरूथिनी एकादशी का व्रत रख सकते हैं, लेकिन वे अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार फलाहार या सामान्य सात्विक भोजन कर सकते हैं। वे निर्जल व्रत रखने का प्रयास न करें, बल्कि केवल अन्न का त्याग करें या अपनी सुविधानुसार व्रत रखें।
निष्कर्ष
वरूथिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है, क्योंकि यह अपने भक्तों को जीवन की कठिनाइयों से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करती है। भगवान विष्णु अपने सच्चे भक्तों को इस व्रत के माध्यम से समस्त पापों से मुक्ति और मोक्ष का वरदान देते हैं। इसीलिए इसे सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जो अटूट श्रद्धा और भक्ति के साथ पालन करने पर महान फल प्रदान करती है।
सभी भक्तों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ वरूथिनी एकादशी का व्रत रखना चाहिए। यह व्रत न केवल सांसारिक सुख-समृद्धि प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और भगवान विष्णु की कृपा भी दिलाता है। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!
आज का पंचांग 25 जुलाई 2026
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