कूर्म अवतार कथा – अध्याय 2: समुद्र मंथन का आरम्भ
समुद्र मंथन का आरम्भ
देवताओं और ऋषियों की व्यथा भगवान विष्णु तक पहुंची। इंद्र और अन्य देवगण अमृत की आस में व्याकुल थे, दैत्यों के अत्याचारों से त्रस्त थे। वे जानते थे कि केवल अमृत ही उन्हें दैत्यों पर विजय दिला सकता है और स्वर्ग लोक की खोई हुई महिमा को पुनः स्थापित कर सकता है। देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें समुद्र मंथन का मार्ग दिखाया, एक ऐसा उपाय जिससे अमृत प्राप्त किया जा सकता था, परंतु इसमें दैत्यों की सहायता की आवश्यकता थी।
विष्णु का आश्वासन और समुद्र मंथन का सुझाव
भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विराजमान थे। उनका दिव्य तेज चारों दिशाओं में फैल रहा था। देवताओं ने बड़ी श्रद्धा से उन्हें प्रणाम किया। भगवान विष्णु का मुखमंडल शांत और गंभीर था, उनकी आँखों में देवताओं के प्रति करुणा झलक रही थी। स्वर्गलोक की शोभा फीकी पड़ गई थी, ऋषिगण चिंता में डूबे हुए थे, देवताओं में निराशा का भाव व्याप्त था। ऐसे में भगवान विष्णु का आश्वासन देवताओं के लिए एक नई आशा की किरण लेकर आया।
भगवान विष्णु ने गंभीर वाणी में कहा, "हे देवगण, तुम्हारी पीड़ा मैं भली भांति जानता हूं। दैत्यों के अत्याचारों से त्रस्त होकर तुम मेरी शरण में आए हो, और मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगा। अमृत ही तुम्हारी रक्षा कर सकता है, परंतु उसे प्राप्त करने का मार्ग कठिन है। तुम्हें समुद्र मंथन करना होगा।" इंद्र ने विस्मित होकर पूछा, "समुद्र मंथन? परन्तु यह कैसे संभव है प्रभु? हम अकेले तो यह नहीं कर सकते।" भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हें दैत्यों की सहायता लेनी होगी। उनसे संधि करो और मंथन में उन्हें भागीदार बनाओ। अमृत निकलेगा तो तुम दोनों का होगा।"
देवताओं और असुरों के बीच सन्धि
देवताओं के लिए यह प्रस्ताव बड़ा विचित्र था, क्योंकि दैत्य उनके शत्रु थे। परन्तु अमृत की आवश्यकता इतनी प्रबल थी कि उन्होंने भगवान विष्णु की बात मान ली। इंद्र ने दैत्यों के राजा बलि से भेंट की और उन्हें समुद्र मंथन का प्रस्ताव दिया। दैत्यों ने पहले तो इस प्रस्ताव को संदेह की दृष्टि से देखा, परन्तु जब उन्हें पता चला कि मंथन से अमृत निकलेगा और वे भी उसके भागीदार होंगे, तो वे मान गए। एक अस्थायी संधि स्थापित हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर अविश्वास करते हुए भी, अमृत पाने के लालच में, साथ मिलकर काम करने का निर्णय लिया।
दैत्यों के राजा बलि ने अपने सेनापतियों से कहा, "यह देवताओं का प्रस्ताव हमें शक्तिशाली बनाने का अवसर ला सकता है। हम अमृत का स्वाद चखेंगे, और फिर स्वर्ग पर राज करेंगे!" दूसरी ओर, इंद्र अपने देवों से बोले, "हमें सावधान रहना होगा। दैत्यों पर विश्वास नहीं किया जा सकता, परंतु हमें अमृत प्राप्त करना ही होगा। भगवान विष्णु की कृपा हम पर बनी रहे।" विष्णु की माया अपरंपार! उन्होंने देवताओं और असुरों को अमृत के लालच में एक साथ ला दिया।
मंदराचल पर्वत मथनी और वासुकि नाग रस्सी
समुद्र मंथन के लिए विशाल मथनी और रस्सी की आवश्यकता थी। देवताओं और दैत्यों ने मिलकर मंदराचल पर्वत को उखाड़कर मथनी बनाने का निश्चय किया। मंदराचल पर्वत इतना विशाल था कि उसे उठाना देवताओं और दैत्यों दोनों के लिए ही असंभव था। तब भगवान विष्णु ने अपनी शक्ति से मंदराचल पर्वत को उठाकर समुद्र तट पर स्थापित कर दिया। मंथन के लिए रस्सी के रूप में वासुकि नाग का उपयोग करने का निर्णय लिया गया। वासुकि नाग शक्तिशाली और विशाल थे, और उन्होंने देवताओं और दैत्यों की सहायता करने के लिए सहमति दे दी।
समुद्र मंथन की तैयारी पूरी हो चुकी थी। मंदराचल पर्वत को समुद्र में स्थापित किया गया और वासुकि नाग को उसके चारों ओर लपेटा गया। एक ओर देवता थे और दूसरी ओर दैत्य, दोनों अमृत की आस में एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े थे। मंथन प्रारंभ होने वाला था, और ब्रह्मांड इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए उत्सुक था। भगवान विष्णु कूर्म अवतार में पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करने के लिए तत्पर थे।
अध्याय 2 का सार: इस अध्याय में देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन का सुझाव दिया। देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लालच में एक अस्थायी संधि हुई, मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। यह दिखाता है कि भगवान की लीला अपरंपार है और वह अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर संभव उपाय करते हैं, भले ही उसमें शत्रुओं की सहायता क्यों न लेनी पड़े।
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